शायद उसी दिन मैं मर गया

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शायद उसी दिन मैं मर गयालगता है जैसे मेरा सपना मुकम्मल हो गया,मरना था जिस दिन... शायद उसी दिन मैं मर गया। बस छह महीने की कहानी थी, मगर उम्र-सी लगती थी,हर सुबह तेरी आवाज़ से मेरी दुनिया जगती थी।हर पल का हिसाब था, हर साँस की ख़बर थी,तेरी एक मुस्कान में मेरी पूरी सहर थी। सुबह की पहली दुआ में तेरा ही नाम आता था,रात का आख़िरी ख़याल भी तुझ तक ही जाता था।दुनिया चाहे जितनी भी शोर मचाती रहती,तेरी आवाज़ सुनते ही दिल को सुकून मिलता था। शेरहर लम्हा तेरे नाम का उजाला साथ चलता था,मुझे क्या पता