ऋगुवेद सूक्ति- (२९) की व्याख्याबहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।ऋगुवेद --१/१६४/३२भाव--बहुत सन्तान वाले बहुत कष्ट उठाते हैं।मंत्र:“बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।”— ऋग्वेद १/१६४/३२पदच्छेद--बहु-प्रजाः निऋर्तिम् ...
ऋगुवेद सूक्ति- (३०) की व्याख्यायह मन्त्र ऋग्वेद (मण्डल 7, सूक्त 32, मन्त्र 14) है। यह सूक्त मुख्यतः इन्द्र की ...
ऋगुवेद (31)की व्याख्या"इमं न: श्रणुहवम्"ऋगुवेद --10/26/9भावार्थ--हे ईश्वर मेरी प्रार्थना को सुनो।ऋग्वेद में प्रयुक्त पद “इमं नः शृणु हवम्” (मेरी/हमारी ...
ऋगुवेद सूक्ति- (32) की व्याख्या"स्तोतुर्मघवन काममा पृण"।ऋगुवेद ---१/५७/५भावार्थ --हे प्रभु! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो।मंत्र :“स्तोतुर्मघवन् काममापृण।”— ऋगुवेद ...
ऋगुवेद सूक्ति--(३३) की व्याख्या"विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि"भावार्थ --हे प्रभु ! सारी विद्याओं का आदि मूल तू ही है।मंत्र —विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि--2.23.2पदच्छेद-विश्वेषाम् + ...
ऋगुवेद सूक्ति-(34) की व्याख्या--"देवो देवनामसि"ऋग्वेद- 1-94-13अर्थ--हे प्रभु ! तू देवों का देव है।विस्तृत भावार्थ :इस मन्त्र में परमात्मा की ...
ऋगुवेद सूक्ति--(३५) की व्याख्या"स न: पर्षदति द्विष:"।ऋगुवेद 10-187-5भावार्थ--वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।पदच्छेद--सः । नः । पर्षत् ...
ऋगुवेद सूक्ति--(३६) की व्याख्या"मा नः प्रजा रीरिषः”ऋगुवेद--१०/१८/१अर्थ-- हे प्रभु ! तू हमारी सन्तानों को नष्ट न कर।शब्दार्थ--मा = मत ...
ऋगुवेद सूक्ति--(३७) की व्याख्या"सत्या मनसो मे अस्तु"ऋगुवेद--१०/१२८/४भाव--मेरे मन के भाव सच्चे हों।"सत्या मनसो मे अस्ति"पदच्छेद--सत्या । मनसः । मे ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (३८) की व्याख्या --"भियं दधाना हृदयेषु शत्रुव:"ऋगुवेद--१०/८४/७भाव--शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न कर दो।भियं दधाना हृदयेषु शत्रूणाम्।शाब्दिक ...