शाही दावतमुंबई की दोपहर की चिलचिलाती धूप अब विहान के शरीर को जला नहीं रही थी, बल्कि उसे अपनी ...
हवेली के उस विशाल दरबार में समय जैसे किसी पत्थर की तरह जम गया था। पेंटिंग से निकला वह ...
पैसा एक साधनसुबह के ठीक सात: चौदह बज रहे थे. मुंबई की सडकों पर उमस और शोर का कब्जा ...
अध्याय - 3 पारस पत्थरविहान के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान उभरी जिसने यक्षिणी को भी पल भर के ...
अध्याय 2 - यक्षिणी चित्राक्षण भर के लिए सब कुछ ठहर गया. जैसे ही खून कागज के रेशों में ...
अध्याय 9 आखरी आदेशहवेली का वह भव्य दरबार अब किसी श्मशान की शांति ओढ़े हुए था। सन्नाटा इतना गहरा ...
अध्याय एक: अपराधीमुंबई की उस रात में उमस नहीं, एक दम घोटने वाली खामोशी थी. उपनगर की एक तंग ...
अध्याय 8:हवेली का वह भव्य दरबार, जहाँ कभी संगमरमर की दीवारों से टकराकर न्याय की गूँज निकलती थी, आज ...
अध्याय 7: तीन दरवाजे और ख़ज़ानातहखाने की उस बर्फीली शांति में अविन की तेज़ होती धड़कनें अब धीरे-धीरे अपनी ...
अध्याय 6: कंकाल-गजसमय: रात्रि 08:15 PMअविन की आँखों के सामने अभी भी धुंधली सी रोशनी थी। जैसे ही उसने ...