Gujarati Whatsapp Status |
Hindi Whatsapp Status
M K
तेरा जाना ही सही था,
मेरा टूट जाना भी सही था,
जब सब सही था तो ,
मैं बुरी कब बनी तेरी निगाहों में,
जो भी था, तेरा छोड़ जाना भी सही था....!!
- M K
Rajesh Pali
तुम दिल के करीब हो,
लेकिन आंखों से दूर हो।
rajan
Ashwin akela kaise bacha?
Baaki sab ke saath kya hua?
Aur kya Captain Vikram Pratap
is sach tak pahunch paayega?
📖 The Unknown Island — Full Edition available on Kindle eBook
M K
मेरे हिस्से का प्यार सिर्फ मुझे मिले,
ये दुआ मुकम्मल भी शायद नहीं होगी...
उस शख्स ने मुझे खुद से और खुदा दोनों से
राब्ता छोड़वा दिया,,,,,
- M K
Raj Phulware
IshqKeAlfaaz
तू पास है...
Saroj Prajapati
ठोकर खाने से क्यों घबराना
माना थोड़ी चोट जरूर लगेगी
लेकिन कदमों को मजबूती भी मिलेगी
सीख जाओगे थोड़ा संभलकर चलना
पहले से कहीं बेहतर दिखने लगेगा
हौसलों को एक नया आयाम मिलेगा
अपने पराए का भेद पता चलेगा
जिंदगी में एक नया तजुर्बा जुड़ेगा।
सरोज प्रजापति
- Saroj Prajapati
Abantika
तस्वीरें बोलती हैं, बस सुनने वाला चाहिए,
सुकून यहीं कहीं है, बस ठहरने का बहाना चाहिए।
न जाने कौन सी दौलत है इन छोटी चीज़ों में,
हज़ार खुशियाँ वार दूँ, सादगी के इन लम्हों में।
✨️धूप, यादें और ये गुलाबी सर्दी✨️
सर्दियों की वो नर्म धूप जब आंगन में उतरती है, तो अपने साथ ढेर सारी पुरानी यादें और एक अजीब सा सुकून लेकर आती है। आज की भागती-दौड़ती दुनिया में, जहाँ हम घड़ी की सुइयों के गुलाम बन चुके हैं, ये तस्वीरें हमें 'Slow Life' यानी ठहरकर जीने का सलीका सिखाती हैं।
सर्दियों का असली मज़ा किसी बड़े मॉल या शोर-शराबे में नहीं, बल्कि उन छोटी-छोटी चीज़ों में है जिन्हें हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। सिल-बट्टे पर पिसती चटनी की वो सोंधी महक, अंगीठी की गर्माहट में सुखाए गए ऊनी कपड़े, और हाथ में चाय का वो गर्म प्याला जिसकी भाप में शायद हमारी आधी थकान उड़ जाती है।
Slow Life का जादू... पेड़ की ऊँची टहनियों में फंसी वो लाल पतंग शायद हम सबकी बचपन की उन ख्वाहिशों जैसी है, जो कहीं पीछे छूट गई हैं। पर आज भी, जब हम ठहर कर उसे देखते हैं, तो वो बचपन फिर से ज़िंदा हो जाता है।
ज़िंदगी बस यही है—धीमी आंच पर पकती हुई चाय, दरवाज़े पर बैठी एक शांत बिल्ली और अपनों के हाथों से मिलती हुई खुशियाँ। चलिए, इस सर्दी थोड़ा कम भागते हैं और थोड़ा ज़्यादा महसूस करते हैं।
ek archana arpan tane
પ્રેમ કરો તો એવો કે પ્રેમ ભગવાન બની જાય પણ જેને કરો એને ભગવાન ના બનાવો.
- ek archana arpan tane
Mayur CHAUDHARY
बंजर जमीन से उग के आया हू,
ये पतझड़ मेरा कुछ नहीं उखाड़ पाएंगे...!!!
Mrs Farida Desar foram
इतना तो फख्र हे मुजे,
अपने आप पर,
की,
बेवफाई नहीं की मैने कभी,
मुहब्बत के नाम पर...
- Mrs Farida Desar foram
Paagla
https://youtube.com/shorts/45Di7K1e9Hw?si=wkMeTWFx4b8MqKI3
cat
और फिर आखिर में,
वो मनपसंद शख्स...
" मेरे मन से उतर गया..।"
written by me....🥀🥀
Ashish jain
मुखौटों का शहर
पॉश गली की कोठियों में, ऊँचे-ऊँचे द्वार थे,
बाहर दरिंदे घूम रहे, भीतर सब 'संस्कार' थे।
चीख गूँजी रात में, पर बंद खिड़की-कान थे,
इंसानियत चुप थी खड़ी, पत्थर हुए इंसान थे।
कोई न आया बचाने को, बस एक बेजुबान लड़ा,
हौसला उस जीव का, उन कायरों से था बड़ा।
नोचते थे वे बदन, वह क्रोध में चिल्ला रहा,
चीख को सुन-सुन के वह, बस रोना अपना पा रहा।
भौर होते ही अचानक, जाग उठीं संवेदनाएं,
हाथ में कैंडल लिए, अब दे रहे सब दुआएं।
कैमरों के सामने, कुछ अश्क भी छलका दिए,
पाप जो कल रात थे, वे मोम से झलका दिए।
वही गवाह 'अशुभ' है, जो सत्य पर है भौंकता,
पाखंड की इस भीड़ को, जो आईना है सौंपता।
'मनहूस' कहकर उस वफ़ा को, दूर सबने कर दिया,
झूठ की चादर तले, फिर सच को उसने भर दिया।
धिक्कार है उस सभ्यता पर, जहाँ रक्षक मौन है,
खुद से पूछो ऐ मनुज, अब जानवर यहाँ कौन है?
मोमबत्ती मत जलाओ, गर लहू ठंडा पड़ा,
इंसान से तो आज वह, 'मनहूस' कुत्ता ही बड़ा।
Adv. आशीष जैन
705301425
Ashish jain
शब्द-संवाद
ये शब्द ही हैं जो घाव देते, ये शब्द ही मरहम बनते हैं,
कभी ये आँखों के आँसू, कभी हंसी का संगम बनते हैं।
जब क्रोध की 'लड़ी' में पिरोकर, ये ज़ुबान से झड़ते हैं,
तब अपनों से ही अपनों के, भीषण युद्ध छिड़ते हैं।
जब तड़-तड़ करती बोली से, मर्यादा की सीमा टूटती है,
तब रिश्तों की नाजुक डोरी, पल भर में ही छूटती है।
शोर बहुत है इन शब्दों में, जो कानों को फाड़ देते हैं,
बने-बनाए जीवन को भी, ये तिनका-तिनका उजाड़ देते हैं।
पर यही शब्द जब प्रेम में ढलकर, हो जाते हैं 'फुलझड़ी',
तब अंधियारे जीवन में भी, जगमगाती है खुशियों की घड़ी।
ये शोर नहीं करते दिल में, बस धीमी चमक बिखेरते हैं,
भटके हुए राही के चेहरे, मधुरता से फेरते हैं।
फिजा बदलती, महक उठती, जब वाणी में मिठास आती है,
शब्दों की कोमल झिलमिल, मन का हर कोना हर्षाती है।
चुन लो तुम भी, तुम्हें क्या बनना—विस्फोटक या प्रकाश,
शब्दों से ही पाताल मिले, और शब्दों से ही आकाश।
Adv. आशीष जैन
7055301422
Ashish jain
उम्मीद का दीया
चहुँ ओर अंधेरा गहरा है, अन्याय का सख्त पहरा है, न्याय की चौखट धूल भरी, और सच का चेहरा उतरा है। माना कि रक्षक सोए हैं, ईमान कहीं हम खोए हैं, पर अंतर्मन की गहराई में, विश्वास के अंकुर बोए हैं।
कलम बिकी, कानून बिका, इंसानियत का जून बिका, मंदिर की सीढ़ी पर बैठ यहाँ, आस्था का पावन खून बिका। सन्यासी की झोली खाली नहीं, ये त्याग वाली दिवाली नहीं, पर फिर भी मन ये कहता है, कि रात अभी मतवाली नहीं।
उठेंगे पैर, रुकेंगे नहीं, हम जुल्म के आगे झुकेंगे नहीं, जब तक न आए वो भोर नई, हम हक की राह तजेंगे नहीं। वो 'राम राज्य' फिर आएगा, हर मन पावन हो जाएगा, इसी भरोसे की लौ को, ये 'आशीष' सदा जलाएगा।
Adv. आशीष जैन
7055301422
Ashish jain
॥ आल्हा: अर्जुन का मान-मर्दन ॥
सुमिरन करूँ मैं सरस्वती माँ का, सुर में दे दे ज्ञान महान, आशीष लेखक की वाणी से, गाऊँ योद्धाओं का गान। कुरुक्षेत्र की उस माटी में, मय मय मचा घमासान, आमने-सामने खड़े हुए थे, अर्जुन और कर्ण बलवान ॥
कर्ण ने खींचा धनुष कान तक, मारो बाण बिजली की ढाल, अर्जुन का रथ दस हाथ खिसका, डोल गया सारा पाताल। फिर अर्जुन ने गांडीव ताना, साधे बाण अग्नि की धार, पंद्रह हाथ कर्ण को ठेला, बोले पार्थ मरो हुंकार ॥
अट्टहास कर बोले अर्जुन, "देखो माधव! मेरा जोर, मेरा बाण है सबसे भारी, कर्ण का बल अब हुआ थोर। वो तो बस दस हाथ हटा पाया, मैंने पंद्रह दिया खिसकाय, मुझसा योद्धा इस दुनिया में, दूजा नजर न कोई आय" ॥
मुस्कुराए तब कृष्ण कन्हैया, बोले "पार्थ! सुनो धरि ध्यान, मूरख जैसी बातें छोड़ो, तज दो अपना ये अभिमान। तेरे रथ पर वीर हनुमान, जो लांघ गए थे सातौ सिन्धु, शेषनाग ने थामे पहिए, मैं हूँ खड़ा जगत् का बन्धु" ॥
"ब्रह्मांड का भार लिए बैठा हूँ, मैं त्रिलोकी का करतार, फिर भी कर्ण ने रथ को ठेला, धन्य-धन्य वो वीर अपार। अगर न होते हम इस रथ पर, उड़ता रथ बन कर के धूल, कर्ण के बाणों की मार से, उड़ जाते तेरे सब मूल" ॥
ग्लानि से भर गए धनंजय, झुका दिया चरणों में शीश, अहंकार जब-जब बढ़ा जग में, तब-तब सीख दिए 'आशीष'। हाथ जोड़ अर्जुन तब बोले, "कर्ण है योद्धा महा-महान", बिना हरी की कृपा के जग में, सब है कोरा ही अभिमान ॥
Adv. आशीष जैन
7055301425
Ashish jain
अहंकार का रथ:
रण-भूमि में खड़ा धनुर्धर, गांडीव हाथ में ताने,
कर्ण और अर्जुन भिड़े परस्पर, मृत्यु न किसी की माने।
कर्ण मारता बाण वेग से, रथ दस हाथ हट जाता,
अर्जुन के प्रहार से तो, रथ कोसों पीछे जाता।
हँसकर बोला पार्थ कृष्ण से, "देखो मेरा जोर,
कर्ण खिसक गया पंद्रह हाथ, मचा युद्ध में शोर।
मेरा रथ तो टस से मस, बस दस हाथ ही हुआ,
क्या सूतपुत्र के बाणों में, बस इतना बल ही मुआ?"
मुस्कुराए त्रिलोकी तब, बोले— "सुन लो पार्थ,
व्यर्थ कर रहे हो तुम जग में, अपना ये पुरुषार्थ।
जिस रथ पर कपिराज स्वयं, हैं ध्वजा थाम कर बैठे,
शेषनाग ने थामे पहिए, क्यों तुम इतना ऐंठे?"
"स्वयं चराचर का जो स्वामी, सारथी बना खड़ा है,
उस रथ को जो दस हाथ हटा दे, वो योद्धा बड़ा है।
अगर न होते हम इस पर, तो ब्रह्मांड पार तुम होते,
कर्ण के केवल एक बाण से, तुम जीवन अपना खोते।"
टूटा तब अभिमान पार्थ का, नयनों में जल आया,
वीर कर्ण के चरणों में, उसने अपना शीश झुकाया।
कहे 'आशीष' पुकार के, तज दे तू अभिमान,
सत्य वही जो कृष्ण कहें, और विमल कर दे ज्ञान।
Adv. आशीष जैन
7055301422
Ashish jain
*शब्द चोर*
चोरों की महफ़िल सजी, लूटें शब्द अपार, मजदूर खटे स्याही से, मालिक करें प्रचार। हृदय से निकली जो कथा, वो जग में हुई महान, पर असली शिल्पी रह गया, जग में अब अनजान।
कहे 'आशीष' सुन लेखका, मत हो तू निराश, तेरी कलम की गूँज ही, है तेरी असली साख। शब्द चुरा लें भले कोई, पर भाव कहाँ से लाएंगे? ये 'रथ' की भारी बात अब, बस तेरे नाम से जानेंगे।
Adv. आशीष जैन
7055301422
Manish Patel
मंजिलें आसान हो जाती है जब कोई अपना अपनेपन से कहता है, तू चिंता मत कर सब ठीक हो जाएगा!!
Ashish jain
*कलयुग की बयार*
झोरी भर-भर बाँट रहे सब, लोभ-लालच की ये बेरा, जीवित होकर मरे पड़े हैं, देख कलयुगी अँधेरा। नाम लिखत हैं अब तो दिल पे, बस सिक्कों की खनक देख, पंच-पटेल भी डोल रहे हैं, गाम-गली की चमक देख।
पईसा की है सिगरी माया, पईसा ही अब धरम है, हाथ काट कर हाथ जोड़ते, कैसा ये भरम है? रो-रो कर कछु काटें जीवन, औरन की खुशहाली में, अपनी थाली सूखी छोड़ें, झाँकें दूजे की थाली में।
माया को डंका ना बाजे, जब यम लेवे डंडा हाथ, कोरी रह जावे चतुराई, कोई ना जावे संग साथ। रोकड़ा और जूता ही बस, आवें यहाँ अब काम रे, बिना भजन और बिना करम के, होवे तू नाकाम रे।
जगत घूमे तू व्यर्थ ही प्यारे, तज दे सब अभिमान, बिना सार के जीवन तेरा, फटे ढोल के समान। कहे 'आशिष' सुन बावरे, कर ले नेक कुछ काम, अंत समय ना काम आएगी, ये माया और ये दाम।
Adv. आशीष जैन
7055301422
Ashish jain
*कलयुग की बयार*
झोरी भर-भर बाँट रहे सब, लोभ-लालच की ये बेरा, जीवित होकर मरे पड़े हैं, देख कलयुगी अँधेरा। नाम लिखत हैं अब तो दिल पे, बस सिक्कों की खनक देख, पंच-पटेल भी डोल रहे हैं, गाम-गली की चमक देख।
पईसा की है सिगरी माया, पईसा ही अब धरम है, हाथ काट कर हाथ जोड़ते, कैसा ये भरम है? रो-रो कर कछु काटें जीवन, औरन की खुशहाली में, अपनी थाली सूखी छोड़ें, झाँकें दूजे की थाली में।
माया को डंका ना बाजे, जब यम लेवे डंडा हाथ, कोरी रह जावे चतुराई, कोई ना जावे संग साथ। रोकड़ा और जूता ही बस, आवें यहाँ अब काम रे, बिना भजन और बिना करम के, होवे तू नाकाम रे।
जगत घूमे तू व्यर्थ ही प्यारे, तज दे सब अभिमान, बिना सार के जीवन तेरा, फटे ढोल के समान। कहे 'आशिष' सुन बावरे, कर ले नेक कुछ काम, अंत समय ना काम आएगी, ये माया और ये दाम।
Adv. आशीष जैन
7055301422
GIRLy Quotes
https://www.instagram.com/reel/DSv4vTcE1MJ/?igsh=Y3libzk0cGZvNzNw
GIRLy Quotes
स्त्री के प्रेम में समर्पण होता हैं सौदा नहीं
त्याग होता हैं स्वार्थ नहीं शिकायत होता हैं
प्रेम झूठा नहीं बस चाहत ये होती हैं की दुख
उसे वहां से ना मिले जहां पर उस ने शुकून
लुटाया है
Sonu Kumar
#VoteVapsiPassBook
प्रश्न : मैं राईट टू रिकॉल पार्टी से वोट वापसी पासबुक के मुद्दे पर चुनाव क्यों लड़ रहा और क्यों युवाओं को अधिक से अधिक राजनीति के क्षेत्र में जाना चाहिए?
उत्तर :
स्थापित राजनैतिक पार्टियाँ चाहती है कि कम से कम युवा चुनावों में हिस्सा ले। यदि ज्यादा लोग चुनावों में आयेंगे तो इनमे ईमानदार / समर्पित / काबिल लोग भी होंगे, और धीरे धीरे मतदाताओ के विकल्प बढ़ने लगेंगे। और विकल्प बढ़ने से बदतर लोगो को चुनौती मिलेगी। पूरी राजनीती कार्यकर्ताओ का टाइम पास करने और उन्हें विकल्प मुहैया नहीं कराने पर चलती है। यदि लोगो को अच्छे विकल्प मिलने लगेंगे तो धीरे धीरे वे या तो बुरे उम्मीदवारों को मैदान से बाहर कर देंगे, या फिर उन्हें जनहित के मुद्दों की और धकेलने में कामयाब हो जायेंगे।
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इसे फिर से पढ़े : या फिर उन्हें जनहित के मुद्दों की और धकेलने में कामयाब हो जायेंगे।
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कैसे ?
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मान लीजिये कि, भारत में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बैंको का एनपीए, सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल की समस्या है और कोई भी पार्टी इसे मुख्य मुद्दा बनाने को तैयार नहीं है। मान लीजिये कि किसी राज्य में विधानसभा चुनाव होते है और इन मुद्दों को अपने घोषणापत्र में शामिल करते हुए किसी विधानसभा से 20 छोटे उम्मीदवार नामंकन दाखिल करते है। तो उस विधानसभा क्षेत्र में चुनावों के दौरान गरीबी / भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुखता से छा जाएगा और बड़ी पार्टी के उम्मीदवार पर चुनाव प्रचार के दौरान यह दबाव बनेगा कि वह इस पर कोई स्टेंड ले।
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यदि वह कोई स्टेंड नहीं लेता है तो जनता के सामने वह एक्सपोज होने लगेगा और जनता देखेगी कि बड़ी पार्टियो के उम्मीदवार इन पर बोल नहीं रहे है। इससे उस पर दबाव बनेगा और बड़ी पार्टी के उम्मीदवार को इस मुद्दे को एड्रेस करना पड़ेगा। और जैसे ही एक बड़ी पार्टी का उम्मीदवार इसे एड्रेस करता है, वैसे ही अन्य बड़ी पार्टियों के उम्मीदवारों को भी इसे एड्रेस करना पड़ेगा। और इस तरह यह मुद्दा उभरकर आ जाएगा। और अब इसे पेड मीडिया को भी रिपोर्ट करना पड़ेगा !!
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और यदि ऐसा 50 विधानसभाओ में होता है तो ये मुद्दे पूरे राज्य में उछलकर आ जायेंगे। लेकिन यदि कोई भी उम्मीदवार इन मुद्दों को लेकर चुनाव में नहीं आएगा तो जनता के पास सिर्फ बड़ी पार्टियों के रूप में 2–3 विकल्प रहेंगे। अत: उनमे से कोई भी इन मुद्दों पर नहीं बोलेगा, और वे पब्लिक का खून गरम करने वाले भाषण देंगे, और सभी बड़ी पार्टियों के उम्मीदवार ऐसा ही करेंगे। इस तरह जब चुनाव में कम विकल्प होते है, तो जनता असहाय हो जाती है। लेकिन यदि कई छोटे छोटे कार्यकर्ता सही मुद्दों पर चुनावों में आ जाते है तो बड़ी पार्टियों को सही मुद्दों को उठाने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
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क्योंकि नेता आपकी बात सिर्फ चुनाव में ही सुनता है, इसके अलावा अगले 5 साल तक कुछ भी बोलते रहिये, वह सुनने का सिर्फ नाटक करता है, लेकिन सुनता नहीं है। लेकिन चुनावों के दौरान नेताओं के कान निकल आते है, और वे सुनना शुरू करते है। तो यदि आप नेता की तवज्जो चाहते है तो आपको चुनाव के दिनों में ही अपनी बात कहनी चाहिए। और चुनावो के दौरान जनता इस मोड में रहती है कि उन्हें सिर्फ उम्मीदवार को ही सुनना होता है। ऐसे में यदि आप उम्मीदवार है, तो जनता भी आपको सुनेगी और नेता भी सुनेगा !!
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मेरा अब तक जो अनुभव रहा है उस आधार पर मैं कह सकता हूँ कि, भारत में दो काम करना सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यो की श्रेणी में आते है :
खुद के कमाए गए पैसे से जमीन खरीदकर बिना किसी लोन के छोटी मोटी मनुफेक्चरिंग यूनिट लगाना
किसी छोटी पार्टी से या निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सांसद / विधायक का चुनाव लड़ना।
युद्ध (War) सबसे बेहतर शिक्षक है। युद्ध जो चीजे सिखाता है, उसे दुनिया में और किसी भी तरह से सीखा नहीं जा सकता। इस तरह युद्ध सबसे बेहतरीन शिक्षक है। युद्ध के बाद शांति काल के सबसे बेहतर 2 शिक्षक ऊपर दिए गए है। ये तीनो शिक्षक सबसे श्रेष्ठ इसीलिए है, क्योंकि इसे किताबों को पढ़कर सीखा नहीं जा सकता। इसके लिए मैदान में उतरना पड़ता है।
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(A)
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अच्छे और काबिल लोग चुनावों में हिस्सा ना ले और राजनीती से दूर रहे इसके लिए उन्होंने कितने सारे गलत क़ानून छापें हुए है, इस विषय पर मैं 100 पेज की पोस्ट लिखूंगा तो भी यह विषय पूरी तरह कवर नहीं कर पाऊंगा। लेकिन राजनीती को जितना मैंने अब तक समझा है उसका पूरा निचोड़ मुझसे पुछा जाए तो मैं कहूँगा कि पूरी राजनीती के डिजाइन का केन्द्रीय उद्देश्य यह है कि - युवाओं को राजनीती में आने से हतोत्साहित किया जाए !!
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वे सिर्फ वोटर चाहते है, राजनैतिक कार्यकर्ता नहीं। एक वोटर वह है जो व्यवस्था में वांछित बदलाव के लिए नेता से उम्मीद करता है। जबकि एक कार्यकर्ता वह है जो अमुक आवश्यक बदलाव के लिए तब स्वयं चुनावों में हिस्सा लेता है, जब अन्य कोई व्यक्ति अमुक मुद्दे पर मैदान में आने को तैयार न हो।
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युवाओं को राजनीति में आने से रोकने के लिए पेड मीडिया निरंतर काम करता है। और वह यह कैसे करता है, इसे समझाने का मेरे पास कोई शोर्ट कट नहीं है। इसे समझने का तरीका सिर्फ यह है कि, आप खुद चुनाव लड़ें। जब तक आप चुनाव नहीं लड़ते तब तक आप इस बात को कभी भी समझ नहीं पायेंगे कि उन्होंने कैसे आपको चुनाव लड़ने से रोका हुआ है। दरअसल चुनाव लड़ने में सबसे बड़ी बाधा वास्तविक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक है।
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पेड मीडियाकर्मियों ने चुनाव लड़ने वालो के खिलाफ समाज में किस तरह का जहर घोला हुआ है, इसका पता आपको तब चलता है, जब आप चुनाव लड़ने का फैसला करते है। और जैसे ही आप यह फैसला लेते है आपके परिवार वालो से लेकर मित्र, रिश्तेदार, अड़ोसी-पडौसी आपको ऐसी नजरो से देखने लगते है जैसे आप कोई निहायत ही फालतू / निकृष्ट / अनुत्पादक कर्म करने जा रहे है।
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ज्यादातर लोग आपका मजाक उड़ायेंगे, ताने कसेंगे और तरह तरह के तंज सुनाकर आपको हतोत्साहित करेंगे। हालांकि उन्हें आपको रोकने से कोई जाती फायदा नहीं होने वाला है। लेकिन पेड मीडिया ने सब तरफ से माहौल ही इस तरह का बनाया हुआ है कि ज्यादातर लोग इसी तरह से पेश आते है। तो सबसे पहले आपको इस मनोवैज्ञानिक लड़ाई से पार पाना होता है, और पिछले 5 साल में मेरा अनुभव है कि 99.9999% लोग इस पहली बाधा को ही पार नहीं कर पाते।
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जो लोग यह सलाह देते है कि युवाओं को राजनीती में नहीं जाना चाहिए, मैं उनसे कहता हूँ कि यदि राजनीती गटर है तो आप वोट क्यों करते है, राजनीती पर टिप्पणियाँ एवं विमर्श क्यों करते है !! मतलब राजनीती पर बहस करना, राजनैतिक टिप्पणियाँ करना, नीतियों पर बहस करना, विभिन्न समस्याओ के लिए राजनेताओ को कोसना और सोशल मीडिया पर राजनीती पर बवाल काटना एक रचनात्मक काम है, लेकिन चुनाव लड़ना एक बदतर गतिविधि है !!
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और यदि राजनीती गन्दी है तो इसकी वजह यह है कि ज्यादा से ज्यादा लोगो को राजनीती में जाने से हतोत्साहित किया जाता है। इससे जनता के पास बेहद बेहद सीमित विकल्प रह जाते है, और उन्हें उन बदतर विकल्पों में से ही किसी को चुनना होता है !! और फिर यही लोग कहते है कि राजनीती में अच्छे लोगो की कमी है। यह एकदम सीधी बात है कि, यदि आप लोगो को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करोगे तभी तो ज्यादा लोग राजनीती में आयेंगे, और जब ज्यादा लोग राजनीती में आयेंगे तो उनमे अच्छे लोग भी होंगे।
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टीवी चेनल्स पर या अखबारों में आपने कई बार इस आशय की बात पढ़ी-सुनी-देखी होगी जिसमें यह बार बार दोहराया जाता है कि एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आपको वोट करना चाहिए, और सोच समझकर वोट करना चाहिए।
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लेकिन क्या आपने अख़बार-टीवी पर कितने बुद्धिजीवियों को यह कहते सुना है कि ज्यादा से ज्यादा लोगो को चुनाव लड़ना चाहिए ताकि मतदाताओ के पास ज्यादा विकल्प हो ? शायद आज तक आपने ऐसा वाक्य कभी भी पेड मिडिया में नहीं सुना होगा !! वे कभी कभार यह कह देंगे कि अच्छे लोगो को आगे आना चाहिए, राजनीती में रुचि लेनी चाहिए, अच्छे उम्मीदवारों को वोट करना चाहिए आदि आदि। लेकिन यह बात कभी भी नहीं कहेंगे कि - यदि आपको राजनीति में सुधार लाना है तो ज्यादा से ज्यादा लोगो को अच्छे मुद्दों को उठाने के लिए चुनाव लड़ने चाहिए !!
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वे कहेंगे राजनीती गटर है, और इससे दूर रहो !! बस !! सोशल मीडिया पर बामा बूम करो, यू ट्यूब पर वीडियो बनाकर अपलोड करो, धरने दो, विरोध करो, समर्थन करो और राजनीति के नाम पर जो मर्जी करो पर चुनाव मत लड़ो !!
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(B)
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चुनाव लड़ना राजनीती में सबसे ज्यादा गंभीर गतिविधि है, और एक्टिविज्म में मेरा एक मुख्य लक्ष्य भारत के ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओ को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करना है। और मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे है। मैं बस उन तक यह बात पहुंचा देना चाहता हूँ कि यदि वे वाकयी व्यवस्था में बेहतर बदलाव चाहते है तो जब तक वे चुनावो में नहीं आते तब तक बात बनने वाली नहीं है। कृपया इस बात को नोट करें कि मेरा यह कहना नागरिको से नहीं बल्कि राजनैतिक कार्यकर्ताओ से है। राजनैतिक कार्यकर्ता वे है जो राजनैतिक विषयों पर टीका करते है, जिनके विमर्श में राजनैतिक दृष्टिकोण प्रकट होता है।
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मैं बहुधा जूरी कोर्ट के बारे में लिखता हूँ। जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट पढने में व्यक्ति को 2 -3 घंटे का समय लगता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति आकर मुझसे कहता है कि वह देश के लिए राजनैतिक सन्दर्भ में 3 घंटे काम करने के लिए उपलब्ध है, तो मैं उससे जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट पढने के लिए नहीं कहूँगा। मैं उससे कहूँगा कि वह चुनाव आयोग की वेबसाईट पर जाकर विधायक का फॉर्म डाउलोड करे और इस डमी फॉर्म को भरे। और फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह व्यक्ति चुनाव लड़ता है या नहीं।
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क्योंकि मेरे मानने में चुनाव का फॉर्म भरना भी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण गतिविधि है। और यह इतनी महत्त्वपूर्ण है कि मैं इसे ड्राफ्ट पढने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। और चुनाव लड़ना तो खैर सबसे महत्त्वपूर्ण है ही।
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यदि आप चुनाव लड़ने इच्छुक है और इसमें आपको यदि किसी भी प्रकार की जानकारी या सहयोग चाहिए तो मुझसे राब्ता कर सकते है। अपनी तमाम व्यस्तताओ के बावजूद मैं आपको यथा शक्ति सहयोग करूँगा। और कृपया इस बात को नोट करें कि मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप मेरे द्वारा सुझाए गए मुद्दों पर चुनाव लड़ते है या खुद के मुद्दों पर चुनाव लड़ते है। आप चुनाव लड़ रहे है, यह भी अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है। तो आप किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ें या निर्दलीय भी चुनाव लड़ रहे तो मुझे सहयोग करने में ख़ुशी होगी।
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मैंने अब तब दो चुनाव लड़े है। एक बार विधायक का और एक बार सांसद का।
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चुनाव का बजट - विधायक का चुनाव 20 हजार के बजट में आसानी से लड़ा जा सकता है। पाठक ध्यान दें कि चुनाव जीतने के लिए आपको कम से 25-30 करोड़ की जरूरत होती है। लेकिन मैं यहाँ चुनाव लड़ने की बात कर रहा हूँ, चुनाव जीतने की नहीं। तो यदि आप 20 हजार रुपया वहन कर सकते है तो चुनाव लड़ने का प्रयास अवश्य करें। इसके लिए आपको एक सहयोगी की भी जरूरत होगी, ताकि पर्चे छपवाने, फ़ार्म भरने आदि में वो आपका सहयोग कर सके। तो यदि आपका साथ देने के लिए 1 भी आदमी तैयार है तो आप चुनाव लड़ सकते है।
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(C)
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चुनाव लड़ने से सम्बंधित कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी :
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चुनाव लड़ने में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण काम है नामांकन भरना। और यह बहुत बहुत महत्त्वपूर्ण काम है। यदि आपने सही तरीके से अपना नामांकन भर दिया तो समझिये आधी लड़ाई जीत ली है। तो यदि आप भविष्य में कभी भी चुनाव लड़ना चाहते है तो सबसे पहला काम यह है कि आप तुरंत चुनाव आयोग की वेबसाईट पर जाकर फॉर्म डाउनलोड करें, और इसे भरकर अपने पास रख ले।
मान लीजिये कि आपको 2 साल बाद आने वाला चुनाव लड़ना है। तो भी 2 साल पहले ही नामांकन भर कर रख ले। नामांकन भरने के कोई पैसे नहीं लगते है। यह मुफ्त में डाउनलोड होता है। अत: आप इसका प्रिंट आउट ले ले और भरकर अपने पास रख ले। जब चुनाव आयेंगे तब इस बारे में अंतिम फैसला करें कि आपको चुनाव लड़ना है या नहीं। यदि नहीं लड़ना है तब भी नामांकन तो भर कर रख ले। और फिर जब चुनावी अधिसूचना निकलेगी तब आपको यदि चुनाव लड़ना है तो चुनाव आयोग में जाकर ओरिजिनल फॉर्म ले आये और पहले से भर कर रखे गए अपने फॉर्म से नकल कर ले।
नामांकन फॉर्म बहुत ही जटिल होता है। मैंने अपने जीवन में इतना जटिल दस्तावेज दूसरा नहीं देखा है। और इसे जानबूझकर बहुत जटिल बनाया गया है। ज्यादातर लोग इसे गलत भर देते है और उनका फॉर्म रिजेक्ट हो जाता है। मुझे इसे भरने में पूरे 7 दिन लगे थे, और फॉर्म आने और इसे जमा करने के लिए सिर्फ 7 दिन की टाइम विंडो ही मिलती है। इस तरह मैंने अंतिम दिन के अंतिम दिन घंटे में अपना फॉर्म जमा कराया।
यदि आपने पहले से नामांकन फॉर्म नहीं भरा है तो आपको वकील के पास दौड़ लगानी होगी। वकील आपको सीधे 25 हजार की फ़ीस सुनाएगा, और इस तरह आपका 25 हजार वेस्ट हो जाएगा। बड़ी पार्टियों के फॉर्म पेशेवर वकील भरते है। लेकिन हम छोटे उम्मीदवार है, अत: हमें अपना फॉर्म खुद ही भरना पड़ेगा, और इसीलिए हमें ज्यादा वक्त चाहिए। इसीलिए मैं कहता हूँ कि पहला स्टेप है डमी फॉर्म भरकर अपने पास रखना। और इस बात का फैसला बाद में करें कि आपको चुनाव लड़ना है या नहीं।
मेरे चुनाव प्रचार में सिर्फ पेम्पलेट होता है। न कोई कार्यालय, न कोई टेम्पू, न बैनर, न विज्ञापन। मैं बस पेम्पलेट छपवाकर बाँट देता हूँ। आप भी ऐसा ही कर सकते है। 1 दिन पेम्पलेट छपाने में लगेगा, और 2 दिन बांटने में। बस और कुछ नहीं करना है। ज्यादा लोड लेना हो तो आपकी इच्छा है। मेरे हिसाब से इतना करना काफी होता है। 1 दिन नामांकन भरने में और 3 दिन पेम्पलेट के। आपको 4 दिन चाहिए होते है। यदि आपके साथ कोई सहयोगी है तो पेम्पलेट का काम 1 दिन में भी हो सकता है। इस तरह आप 2 दिन और 20 हजार खर्च करके चुनाव लड़ सकते है।
यदि आप महाराष्ट्र एवं हरियाणा के निवासी है तो मालूम हो कि 4 अक्टूबर नामांकन भरने की अंतिम तिथि है। अत: आप यह चुनाव भी लड़ सकते है। यदि आप अन्य राज्यों के निवासी है तो भी नामांकन भरकर रखे ताकि आगामी विधानसभा चुनावों में आप चुनाव लड़ सके।
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राजनीति को देखने के दो दृष्टीकोण है :
वोटर का दृष्टिकोण , और
उम्मीदवार का दृष्टिकोण।
यदि आप चुनाव लड़ लेते है तो आपको राजनीति को समझने का एक और दृष्टिकोण मिलेगा। और यह दृष्टिकोण वाकयी महत्त्वपूर्ण है। अत: मेरा मानना है कि एक राजनैतिक कार्यकर्ता को विधायक या सांसद का चुनाव लड़ने का प्रयास अवश्य चाहिए, ताकि वह राजनीति के उन पहलूओ को देख सके, जिसे ज्यादातर लोग नहीं देख पाते। और इस बात से कभी फर्क नहीं पड़ता कि आपको कितने वोट मिले है।
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(D)
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गैर राजनेतिक संगठन बनाकर राजनैतिक मुद्दों पर काम करना दुनिया की सबसे गन्दे किस्म की राजनीति है ।
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राजनीति को सत्ता के लालच से जोड़ कर देखा जाता है, इसीलिए अपना नैतिक मापदंड बनाए रखने के लिए कई संघठन गैर राजनेतिक गतिविधियाँ संचालित करते है, लेकिन उनके लक्ष्य हमेशा राजनेतिक होते है । अवाम में राजनेतिक विवेक पनपने से राजनेतिक सत्ताओ को चुनोती मिल सकती है, इसलिए कार्यकर्ताओं का टाइम पास करने के लिए उन्हें निस्वार्थ सेवा के ऊँचे आदर्श में उलझा दिया जाता है ।
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राजनेतिक दल पेड मीडिया, पेड बुद्धिजीवीयों, पेड स्तंभकारो, पेड पाठ्य पुस्तक लेखको की सहायता से आम जन के राजनेतिक विवेक को परिपक्व करने वाली सूचनाओं को बाधित कर देते है। इससे शासको के लिए शासन करना आसान हो जाता है ।
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उदाहरण 1 : जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के बाद देश की अवाम में भारी असंतोष पनपने लगा था। महात्मा लाला लाजपत राय, और महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल के नेतृत्व में महात्मा भगत सिंह, महात्मा चन्द्र शेखर आज़ाद, महात्मा बटुकेश्वर दत्त तथा महात्मा राजगुरु जैसे हज़ारो युवाओ का मोहन गांधी से मोहभंग हुआ, और युवा राजनेतिक गतिविधियों में रूचि लेने लगे । ये क्रांतिकारी राईट टू रिकाल कानूनों और पूर्ण स्वराज्य की मांग कर रहे थे । इनकी बढ़ती लोकप्रियता लाखो युवाओं में राजनेतिक विवेक का संचार कर सकती थी ।
निदान : अंग्रेजो के निर्देश पर जवाहर लाल और मोहन गांधी ने 1924 में 'सेवा दल' की स्थापना की । इस दल के कार्यकर्ताओं को राजनेतिक गतिविधियों में भाग न लेने की शपथ दिलाई गयी ।
सेवा दल ने लाखो कार्यकर्ताओं को सुबह व्यायाम करने, जन जागरण और समाज सेवा जैसे अनुपयोगी कार्यो में इसीलिए उलझा दिया ताकि, कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट हो जाए, और पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले क्रान्तिकारियो को कार्यकर्ता नही मिल सके ।
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उदाहरण 2 : 1922, तुर्की के खिलाफत आन्दोलन के दौरान मोहन गांधी आज़ादी की लड़ाई को हाशिये पर धकेल कर खिलाफत आन्दोलन में कूद गए थे । यह वाकयी में एक अजीब स्थिति थी। मोहन के इस कदम से हिन्दू नाराज हुए और हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण होने लगा ।
इसी दौरान अखिल भारतीय हिन्दू महासभा नामक राजनेतिक संघठन खड़ा हो रहा था और उनके एजेंडे में चुनाव लड़ना भी शामिल था। यदि ऐसा होता तो मोहन गांधी और जवाहर लाल का युवाओं को चरखे, बकरी का दूध, खादी, भजन, अनशन और साफ़ सफाई में उलझाए रखने का कार्यक्रम खटाई में पड़ सकता था, जिस से ब्रिटिश साम्राज्य को नुकसान होता। ब्रिटिश भारत के युवाओं को सक्रीय राजनीती में नही आने देना चाहते थे।
निदान : अंग्रेजो की अनुमति से सिंधिया राजवंश ने एक छद्म हिन्दू वादी अराजनेतिक संगठन 'X' को खड़ा करने के लिए धन मुहैया कराया, ताकि हिन्दू महासभा को तोड़ा जा सके ।
संघठन X ने सिंधिया तथा अन्य देशी राजाओं से प्राप्त चंदो से लाखो हिन्दू कार्यकर्ताओं को खींच कर परेड करने, लाठी चलाना सीखने , राष्ट्र भक्ति के गीत गाने, ध्वज वंदन करने और नारे लगाने जैसे अनुपयोगी और अराजनैतिक कार्यो में उलझा लिया। हिन्दू महासभा को कार्यकर्ता और चंदे मिलने बंद हो गए, और यह संघठन टूट गया। चूंकि हिन्दू महासभा राजनेतिक लक्ष्यों के लिए नागरिको को संघठित कर रही थी, इसलिए इनके नेता हमेशा अंग्रेजो के निशाने पर रहे ।
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इस समय भारत एक अजीब स्थिति से गुजर रहा था, जिसमे एक और मोहन और जवाहर युवाओं को अनशन और चरखे से जबकि X परेड और लाठियों से आज़ादी लाने का विश्वास दिला रहे थे ( और दिला भी चुके थे), वही दूसरी और देश में कार्यकर्ताओं के अभाव से जूझ रहे राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस देश से बाहर जाकर कार्यकर्ताओं को इकठ्ठा कर के दुनिया की सबसे ताकतवर सेना से लड़ने के लिए फ़ौज खड़ी कर रहे थे।
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उदाहरण 3 : आजादी बचाओ आन्दोलन के प्रणेता महात्मा राजीव भाई दिक्षित 1985 से ही स्वदेशी का प्रचार कर रहे थे । पिछले 70 वर्ष में वो अकेले शख्स है जिन्होंने लाखों कार्यकर्ताओं को राजनेतिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण सूचनाएं दी । व्यवस्था परिवर्तन के तथा विदेशी शासको से भारत की मुक्ति के लिए वो पूरे देश में घूम घूम कर 25 वर्ष तक राजनेतिक जन आन्दोलन की जमीन तैयार करते रहे । उन्होंने लाखों नागरिको को FDI के दुष्प्रभाव से परिचित कराया कि, कैसे FDI जनित विकास भारत को फिर से ग़ुलाम बना देगा ।
निदान : चूंकि राजीव भाई राजनेतिक आन्दोलन खड़ा कर रहे थे, अत: इसे तोड़ने के लिए आरएसएस ने स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की। आरएसएस, बीजेपी और धनिको से प्राप्त सरंक्षण और अनुदान से स्वदेशी जागरण मंच ने लाखों कार्यकर्ताओं को अपनी और खींचा और बीजेपी को सत्ता हासिल हुयी, 1999 में सत्ता में आते ही बीजेपी ने स्वदेशी के मुद्दों को दरकिनार कर दिया ।
ज़्यादातर बड़े समाज सेवी संघठन सत्ता में सेंध लगाने का ही कार्य करते है । यह कोयले की दलाली के बावजूद हाथ काले न होने देने का एक पैंतरा है । ये भारी भरकम गैर राजनेतिक संघठन समाज सेवा के नाम पर लाखो करोड़ो कार्यकर्ताओं को आकर्षित करते है, तथा उनकी मदद से परोक्ष राजनेतिक ताकत हासिल करते है । इसमें फायदा यह होता है, कि राजनेतिक दल इन अराजनेतिक संघठनो के भ्रमित कार्यकर्ताओं के प्रति जवाबदेह नही रहता, तथा इन संघठनो के पास हमेशा बच निकलने की यह पतली गली रहती है कि अमुक राजनेतिक दल उनकी उम्मीदों पर खरा नही उतरा। इस प्रकार ये अराजनैतिक संघठन अमरये बकरे बने रहते है ।
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बड़े संघठनो के अलावा इसी तासीर के हज़ारो अराजनैतिक संघठन देश में संचालित है, जिनका एकनिष्ठ उद्धेश्य नागरिको या धनिको से चंदा लेकर कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट करना होता है, ताकि उन्हें सक्रीय राजनीति में आने से रोका जा सके। आपको किसी भी जिले में इस तबियत के सैंकड़ो छोटे मोटे संगठन मिल जायेंगे जिनका मॉडल कुछ इस तरह का होता है :
इनकी जिले स्तर पर एक कार्यकारिणी होती है, जिसमे 10-20 सदस्य/पदाधिकारी होते है।
इन अध्यक्षों / उपाध्यक्षो/ सचिवो / कोषाध्यक्षो आदि नामधन्य पदाधिकारियों के हाथ जोड़ते हुए से फोटो वगेरह आप अखबारों और शहर के मुख्य चौराहों पर चस्पां हुए देख सकते है।
वक्त जरुरत इन पदाधिकारियो द्वारा कार्यकर्ताओं का टाइम खपाने एवं संघठन से चिपकाये रखने के लिए एक सभा रखी जाती है, जिसके प्रारम्भ मालाएं और साफे पहनाने तथा समापन संघठन में ही शक्ति है टाइप के नारो से होती है। अमूमन सभा के मध्य में चाय, बिस्किट, समोसो आदि के सिवाय कोई तार्किक एजेंडा नही होता, अत: गाहे बगाहे समस्या के समाधान सुझाने की जगह सिद्धांतो की रूटीन भाषण बाज़ी कर इति कर ली जाती है ।
कार्यकर्ताओं को व्यस्त रखने के लिए ये संगठन रक्तदान शिविर लगाना, भोजन वगेरह बांटना, पेड़ लगाना, जयंतिया मनाना, प्याऊ चलवाना, नये मेंबर बनवाना, भभका पैदा करने के लिए नारों के साथ जुलुस और वाहन रेली निकालना आदि तथा इसी तरह की फौरी गतिविधियाँ संचालित करते है ।
अमूमन इस प्रकार के सभी संगठन कार्यकर्ताओं को राजनेतिक रूप से महत्त्वपूर्ण सूचनाये नही देते, और उन्हें राजनीती से दूर रहने की घुट्टी देते रहते है।
इनका मुख्य डायलॉग होता है, यहाँ राजनीती मत करो, राजनीती गन्दी चीज है, आदि आदि !!
पेड मीडिया में इस तरह के बड़े अराजनैतिक संगठन चलाने वालो को काफी सकारात्मक कवरेज दिया जाता है, और उनके इस अराजनैतिक पने को एक खासियत की तरह उभारा जाता है कि, देखो ये लोग कितने निस्वार्थ है कि राजनीति की गंदगी से दूर रहकर सेवा का कार्य कर रहे है !!
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कुल मिलाकर, उन्होंने लोगो को राजनीति में जाने से रोकने के लिए काफी अच्छा सेट अप लगाया हुआ है !!
मैं यह लेख पढ़ने वाले से पूछना चाहता हूं की क्या आप भारत देश की समस्याओं को सुलझाने में देश की उन्नति में अपना योगदान देना चाहते हैं तो कृपया आप अपनी बात राजनीति में सक्रिय योगदान देकर अपनी बात जनता के सम्मुख प्रमुखता से रखें बहुत सी राजनीतिक पार्टियों हैं आप उन पार्टियों से टिकट लेकर या निर्दलीय चुनाव लड़े अगर आप एक मंच चाहते हैं और चुनाव लड़ना चाहते हैं तो कृपया निम्नलिखित नंबरों पर व्हाट्सएप करें हम आपको टिकट भी देंगे आपका नामांकन फार्म भी भरवाने में मदद करेंगे और अपनी क्षमता अनुसार फाइनेंशियल सहयोग भी प्रदान करेंगे आने वाले विधानसभा चुनाव असम बंगाल तथा कई छोटे राज्यों में 2026 में चुनाव होने की प्रबल संभावना है इच्छुक कार्यकर्ता देशहित में चुनाव लड़ने के लिए संपर्क कर सकते हैं.
शिव प्रसाद गुप्ता 7007184869
महावीर प्रसाद कुमावत 9887742837
Kamini Shah
લહેરે તિરંગો શાનથી
શહીદોનાં બલિદાનથી…
-કામિની
Gautam Patel
ભારત ચીનના યુદ્ધનો દીર્ધદ્રષ્ટા
ચીનના ભાવિ
ખતરા અંગે ચેતવણીની પ્રથમ સાયરન
જેણે વગાડી એ દીર્ઘદૃષ્ટા ભારતીય નહિ,
પણ અંગ્રેજ હતો. નામ મેજર-જનરલ
ડબ્લ્યુ. ડી. એ. લેન્ટેઇન હતું. દક્ષિણ
ભારતમાં વેલિંગ્ટન ખાતેની ડિફેન્સ
કોલેજનો તે સર્વિસિઝ સ્ટાફ
(પ્રિન્સિપાલના દરજ્જાનો) કમાન્ડન્ટ
હતો. ભારત પ્રત્યે લગાવ હોવાને લીધે
તેણે ૧૯૪૭માં સ્વદેશ પાછા ફરવાનું
માંડી વાળી ડિફેન્સ કોલેજના ભારતીય
અફસરોને તાલીમ આપવાના કાર્યને
વળગી રહ્યો હતો. ચીને તિબેટ પર કબજો
જમાવ્યાના સમાચાર મળ્યા બાદ
ઓક્ટોબર, ૧૯૫૦માં લેન્ટેઇન ચાલુ
પીરિઅડે લેક્ચર હોલમાં પ્રવેશ્યો અને
પીરિઅડ લેતા સીનિઅર ઓફિસરને ટૂંક
સમય પૂરતું લેક્ચર રોકવાનું કહી
તાલીમાર્થી અફસરોને સંબોધ્યા. બહુ
સ્પષ્ટ શબ્દોમાં તેણે ભારતના રાજકીય
આગેવાનોને તેમની ટૂંકી દૃષ્ટિ બદલ
વખોડી કાઢ્યા.
અફસરોને ચેતવણીના સૂરમાં
જણાવ્યું કે ચીનાઓ તિબેટમાં ઘૂસી આવ્યા
પછી ભારતની સરહદનો દરવાજો ખૂલી
ગયો હતો. ભવિષ્યમાં તે
દ્વાર મારફત ચીની લશ્કર
ક્યારેક ને ક્યારેક ભારત
પર અચૂક આક્રમણ
લાવવાનું હતું, માટે ભારતે
અત્યારે જ પ્રતિકાર માટે
લશ્કરી તેમજ વ્યૂહાત્મક
તૈયારીઓ શરૂ કરી દેવી
જોઇએ.
મેજ૨-જન૨લ લેન્ટેઇને છેલ્લે તાલીમાર્થી
અફસરોને કહ્યું :
‘ભવિષ્યમાં તમારા પૈકી
અમુક જણાએ ચીનાઓ
સામે લડવાનો વારો
આવશે.' ભવિષ્યવાણી
સાચી પડવાની હતી.
લેક્ચર હોલમાં મોજૂદ
રહેલા ભાવિ બ્રિગેડિઅર જે.પી. દળવીના અને ભાવિ
લેફ્ટનન્ટ-કર્નલ બૈજ મહેતાના ભાગ્યમાં ૧૨ વર્ષ
પછી ખરેખર યુદ્ધમો૨ચે જવાનું લખ્યું હતું. દળવી
યુદ્ધકેદી તરીકે પકડાવાના હતા, જ્યારે મહેતાના નસીબમાં તો શહીદી હતી.
મેજર-જનરલ લેન્ટેઇનનો અવાજ
દિલ્હી સુધી પહોંચવાનો ન હતો, પણ
સદ્ભાગ્યે નાયબ વડા પ્રધાન સરદાર
પટેલ ત્યાં હંમેશ મુજબ જાગૃતાવસ્થામાં હતા.
માત્ર નેહરુને જગાડવાનું અઘરું
કામ તેમણે કરવાનું હતું, જેમાં સફળતા
મળવાનો ચાન્સ બહુ ઓછો હતો. આમ
છતાં નવેમ્બર ૭, ૧૯૫૦ના રોજ તેમણે
નેહરુને લાંબો પત્ર લખી ચીનના જોખમ
અંગે વાકેફ કર્યા. પત્રનો સાર એ કે ચીન
ખાતેના ભારતીય એલચી કે. એમ.
પર્ણિકર તેમના દરેક રિપોર્ટમાં તે
સામ્યવાદી દેશના વલણને બેબુનિયાદ
રીતે મૈત્રીભર્યું ગણાવી રહ્યા હતા.
(પર્ણિકર હાડોહાડ સામ્યવાદી હતા અને
ચીન પ્રત્યે હમદર્દી ધરાવતા હોવાનું
તેમના અહેવાલોમાં સ્પષ્ટ જણાતું હતું).
ભવિષ્યમાં દૂર સુધી નજર પહોંચાડી
શકતા સરદાર પટેલે નેહરુને દેશનું
લશ્કરી ખાતું તાકીદે મજબૂત બનાવવાનુ
સૂચવ્યું. સરદારનો પત્ર જો કે એળે ગયો
અને બીજે મહિને તો તેઓ અવસાન
પામ્યા. નેહરુને અરીસો દેખાડે તેવી
એકમાત્ર વ્યક્તિને દેશે ગુમાવી દીધી.
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Ashish jain
।। मन का मिलन ।।
जब राहें ही न जुड़ पाएँ, तो साथ चलना कैसा है?
बिना मिले दो दीपों का, एक साथ जलना कैसा है?
पर प्रेम तो वह अदृश्य डोर है, जो खिंचती चली जाती है,
बिना बात के भी यह रूह, एक-दूसरे को पाती है।
मुलाकात तो बस शरीर की है, असली मिलन तो मन का सावन है,
जहाँ यादों की बूँदें गिरें, वहीं प्रेम का पावन आँगन है।
बिना बोले जो सुनाई दे, वह धड़कन का गीत निराला है,
बिना छुए जो तन को भिगो दे, वह नेह का प्याला है।
यदि जज़्बात के बीज न हों, तो रिश्ता रेत का महल है,
और अगर अहसास जिंदा हैं, तो हर मुश्किल का हल है।
जैसे चकोर और चाँद का मिलना, बस आँखों का एक सपना है,
वैसे ही दूर रहकर भी, मेरा हर हिस्सा तेरा अपना है।
वजह न पूछो मिलने की, यह तो साँसों का बंधन है,
बिना मिले जो महकता रहे, यह वही यादों का चंदन है।
जहाँ दो दिल एक हो जाएँ, वहाँ दूरी का क्या काम?
बिना बात और बिना मुलाकात, पूरा होता है प्रेम का नाम।
adv. आशीष जैन
7055301422
kajal Thakur
🌸🌸
“तुम्हें चाहना मेरी कोई आदत नहीं,
ये तो वो इबादत है जो हर सांस से जुड़ी है।
तुम सामने न भी हो तो क्या फर्क पड़ता है,
मेरे दिल की हर धड़कन में बस तुम्हीं की धुन बसी है।” ✨
Kajal Thakur 😊
zaara
என் சுவாசக் கூட்டின் சுடரே!"
மண்ணின் மணம் வீசும் என் கிராமத்து தேவதையே,
உன் கொலுசு ஓசையில்தான் என் விடியலே பிறக்குது.
ஆலமரத்து நிழலாய் நீ என்னைத் தழுவக் காத்திருக்கிறேன்,
உன் ஒற்றைப் பார்வையில் என் உலகமே அடங்கிப்போகுது.
வயல்வெளி வரப்பில் நீ நடந்து வரும் அழகைக் கண்டால்,
மடை திறந்த வெள்ளமாய் என் காதல் கரைபுரளுது.
தாமரை பூத்த குளமாய் உன் கண்கள் என்னை ஈர்க்க,
தறிகெட்டு ஓடும் காற்றாய் உன்னைச் சுற்றுகிறேன் நான்.
மார்கழிப் பனித்துளியாய் என் மனதை நனைக்கிறாய்,
மாலை நேரத்துத் தென்றலாய் வந்து வருடிச் செல்கிறாய்.
நூறு ஜென்மம் எடுத்தாலும் உன் நிழலாகவே இருப்பேன்,
உன் புன்னகை ஒன்றே என் வாழ்வின் பெரும் பொக்கிஷம்.
மழை மேகம் கண்ட மயிலாய் நீ ஆடும் போது,
என் இதயத் துடிப்பில் புது ராகம் ஒன்று பிறக்குது.
வேப்பமரத்துக் காற்றும் உன்னைத் தொட்டு வந்தால் - அது
சந்தனக் குழம்பாய் என் மேனியில் குளுமை தருது.
ஊர் திருவிழா கூட்டத்தில் உன்னைத் தொலைத்து விடாமல்,
உன் கைவிரல் பிடித்துக் காலமெல்லாம் நடக்க ஆசை.
பொட்டு வைத்த உன் நெற்றியில் என் உலகம் தெரியுது,
விட்டுப் பிரியாத உயிராக உன்னோடு கலக்கத் துடிக்கிறேன்.
வாடிவாசல் காளையாய் அடங்காத என் திமிரையும்,
உன் ஒற்றைப் புன்னகையில் அடக்கி விட்டாய் பெண்ணே.
வாழ்வின் இறுதி வரை உன் மடியில் நான் உறங்க வேண்டும்,
சாவே வந்தாலும் உன்னோடு மடிய வரம் வேண்டும்!
Bhavna Bhatt
સુંદર પ્રોગ્રામ
Nilesh Rajput
उसे किसी और से मोहब्बत है,
और हमें उससे—
जिसे किसी और से मोहब्बत है।
Shailesh Joshi
આપણી પાસે
ક્યારે શું કરાવવું ?
એ ખાલી ઈશ્વરને ખબર છે, છતાંય
આમ કરું ને તેમ કરું માં, માણસ બે-ખબર છે ?
- Shailesh Joshi
Std Maurya
मत कहो हमें रटने वाले,
हम नया पैगाम रचते हैं।
काँटों से गुज़रकर हम तो,
फूलों की महक बिखेरते हैं।
धूप-छाँव को महसूस कर,
शब्दों को रंगों में उतारते हैं,
हम फसल की तरह उगते हैं।
कोई न समझे तो टूट जाते हैं,
काँटों और फूलों में हमें फर्क नहीं दिखता,
हम काँटों को भी फूल समझते हैं।"
- Std Maurya
Std Maurya
मत कहो हमें रटने वाले,
हम नया पैगाम रचते हैं।
काँटों से गुज़रकर हम तो,
फूलों की महक बिखेरते हैं।
धूप-छाँव को महसूस कर,
शब्दों को रंगों में उतारते हैं,
हम फसल की तरह उगते हैं।
कोई न समझे तो टूट जाते हैं,
काँटों और फूलों में हमें फर्क नहीं दिखता,
हम काँटों को भी फूल समझते हैं।"
- Std Maurya
Saliil Upadhyay
चावल से बर्फ केसे बनाये?....
RICE मे से R निकाल दो..।
बस आपका बर्फ़ रेडी...!
ऐसे ज्ञान के लिए हमसे जुड़े रहिए और खुश रहीए...।
- Saliil Upadhyay
Saliil Upadhyay
चावल से बर्फ केसे बनाये?....
RICE मे से R निकाल दो..।
बस आपका बर्फ़ रेडी...!
ऐसे ज्ञान के लिए हमसे जुड़े रहिए और खुश रहीए...।
- Saliil Upadhyay
Shailesh Joshi
જ્યાં ભગવાન પર પૂર્ણ ભરોસો હોય,
ત્યાં ડર, ચિંતા, ઈર્ષ્યા, ઉતાવળ કે પછી ફરિયાદો..જરાય ન હોય.
- Shailesh Joshi
Dada Bhagwan
Do You Know when you do something auspicious or give to charity, give with the awareness and intent that others will benefit from your donation?
Read more on: https://dbf.adalaj.org/Tt7gfJeI
#humanity #charity #donation #DadaBhagwanFoundation #facts
Imaran
तेरी चुप्पी का सबब हम जानते है , लरज़ते होंठों की शिकायत हम जानते है , मेरी हिचकी भी दे रही है गवाही मुहब्बत की, तेरे पलकों की हरकत भी हम जानते है
imran
😘😘😘
Jyoti Gupta
#26January #RepublicDay #RepublicDaySpecial #Deshbhakti #JaiHind #MeraBharat#AnandDham #MandirDarshan #BhaktiVideo #SpiritualIndia #TempleVibes#DeshAurDharma #AIVideo #TrendingVideo #IndianReels #ViralReels #ShortsIndia#BharatMataKiJai #VandeMataram #IndianCulture
રોનક જોષી. રાહગીર
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GIRLy Quotes
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સુરજબા ચૌહાણ આર્ય
ગર્ભપાત કરાવવું મંદિર
તોડવા બરાબર છે
" આર્ય"
वात्सल्य
પોતાનો પ્યાર પોતાનાં સપનામાં હોય અને એ સમણું પોતાને હૈયે હોય ત્યાં ઊંઘ જ આવે કેમકે પ્યારમાં બન્ને શરીર તરબોળ હોય ત્યાં ચોટી પડી બધી યાતના ચિંતા કોરાણે મૂકી નીરવ શાન્તિ મળે ત્યાં ઊંઘ જ આવે
- વાત્સલ્ય
Parag gandhi
*🦚જય શ્રી કૃષ્ણ🦚*
*‼️ તમે કેટલું દોડી શકો છો એ ના પર નહિ.. તમે કેટલું છોડી શકો છો એ ના પર સુખ નો આધાર છે.... ‼️*
M K
मैं मोहब्बत में पड़ी नासमझ लड़की,
तुम मेरी एहसासों तले दबे दर्द को समझ पाए क्या?
संस्कारों से बंधी हूं मैं जरा सम्भल कर रहना,
समाज के बनाए रिवाजों को तोड़ पाए क्या?
मुक्कमल हों, मुझसे ज्यादा तुम्हारी दिल्लगी जरूरी थी
मुझसे ज्यादा तुम मोहब्बत कर पाए क्या?
- M K
Parmar Mayur
जो मन को शांत ना कर सके,
कोई बात नहीं,
किन्तु मन को अशांत करे।
जो खुशी ना दे पाए कोई बात नहीं,
पर हृदय भीतर बोझ पैदा करे।
जो विवेक को मार दे,
या दयाभाव से दूर करे ,
उन्हें छोड़ देना ही हमारी बुद्धिमत्ता की पहचान होगी ।
फिर चाहे वो कर्म हो,
विचार हो या फिर,
कोई अपना व्यक्ति हो।
त्याग ही उचित है,
वरना हमें दुःख, दर्द ही मिलेगा।
Deepak Bundela Arymoulik
जो चलना छोड़ दे, वो साँस लेता हुआ भी
धीरे-धीरे थक जाता है,
जो सवाल नहीं करता,
उसका जवाब समय खुद लिख जाता है।
रास्ते अगर पैरों से नहीं गुजरें,
तो सपने आँखों में सड़ने लगते हैं,
किताबें अगर हाथ न छुएँ,
तो शब्द भी चुप्पी सीख लेते हैं।
ज़िंदगी अगर सुनी न जाए,
तो शोर भी बेआवाज़ हो जाता है,
और जब कोई नाराज़ न हो आपसे,
तो समझो आपसे कुछ छूट जाता है।
यात्रा, किताब, ध्वनि और टकराव—
यही तो जीवन की धड़कन हैं,
इनसे दूर रहकर जीना
असल में धीरे-धीरे मर जाना है।
आर्यमौलिक
Dr Darshita Babubhai Shah
मैं और मेरे अह्सास
सपनें
सपनों की रजाई ओढ़े सो जाते हैं l
सुनहरे भावी को पाने खो जाते हैं ll
आज ऊँची उड़ान की ख्वाईश में l
थोड़ी ही देर में दिवाने हो जाते हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह
Kartik Kule
की प्रश्नाच्या उत्तरासाठी मला शब्दांचीही कमी भासत होती। आठवणीत तुला मागितलेले तुजे नाव व त्याची ती चार अक्षरच मला माहित होती ।तुला वाटल तुजावर रागावलो आहे मी पण देवाकडे मागितलेल्या तुझ्या नावाची मी परत फेडच कधी केली नव्हती। सांगता नाही येणार तुला माझी भावना बिना शब्दांची।
म्हणून विचारतो देशील का थोडी भीक मला थोड्या शब्दांची
- Kartik Kule
Kartik Kule
सावलो में आपसे हम जबाब क्या मांगेंगे
जख्म एसा दिया ही जो दिखा भी ना पायेंगे
आपके लफजोकी वो शिहादते हमे एसा घाव दे गई
अगर चहेभी दिल हमार आपको फिरभी नजरे अपनेअप फेर लेंगी
- Kartik Kule
GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
सत्यरूपणी मातु है, ज्ञानरूप है बाप। दिल सुत से दुखता रहा, रिसता उनका शाप।।
दोहा --३९९
(नैश के दोहे से उद्धृत)
----गणेश तिवारी 'नैश'
kattupaya s
Good morning friends.. have a nice day
Roshan baiplawat
रात 3:20
બદનામ રાજા
કેટલી મીઠાશ થી દાઝ્યો છું એ કેમ કહેવું!
મેં જ આંગળીઓ બોળી હતી ઊકળતી
લાગણીઓ માં...
🌸
S K I N G
तुम्हे टूटकर प्यार करते करते तुम्हीं को खो देना मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा था ।
Rajiv Jangid
पत्थर के शहर से,
भीड़ के शोर से,
मैं दूर जाना चाहता हूँ।
यहां रोक लेते है,
बीच चौराहे पर,
एक भीड़ को,
दूसरी भीड़ के लिए।
अनजानी भीड़ का,
मैं भी हिस्सा होता हूँ,
कभी इस ओर,
कभी उस ओर।
मैं ऊब चुका हूँ,
शहर के नियमों से,
थक सा गया हूँ,
भीड़ की नितियों से।
मैं जीना चाहता हूँ,
शहर से दूर,
भीड़ से अलग,
मन की दिशा में,
और एकांत में।
Dr. Damyanti H. Bhatt
પ્રજાસત્તાક પર્વની હાર્દિક શુભેચ્છાઓ 🌹🌹🙏🌹🌹
M K
कभी कभी,
मैं बोलती तो बहुत हूं ,
पर सिर्फ अपनों के सामने
लेकिन अपना और पराया कौन है
फर्क करना भूल चुकी हूं
दिल तोड़ने और भरोसे तोड़ने का
रिवाज़ निभाया जा रहा है...!!
- M K
M K
तुम मेरे हो ही नहीं तो, तुम पर अपना हक क्यों करूं??....
सफर छोटा ही सही मगर यादगार होगा ।।
- M K
Saroj Bhagat
વાહરે કિસ્મત!!
કાશ! તકદીર નામકી
કોઈ બલા ના હોતી ,
હોઠોપે ફરીયાદ,ઓર
દામનમે આંસુઓ કી
સોગાત ના હોતી.
ખુશીઓ કી કિલકારીઓસે
ઘરઆંગન ગુંજતે રહેતા.
સ્વપ્નોકી મુસકાનોસે
જીવન બાગ મહેકતા
રહેતા. કાશ!!!
bhavesh
@groww_with_bk_ 🙏Instagram follow please
rajan
The Unknown Island की कहानी का विस्तृत संस्करण ई-बुक के रूप में उपलब्ध है।
जो पाठक इस रहस्य की पूरी यात्रा और आगे की घटनाएँ जानना चाहते हैं, वे डिजिटल संस्करण देख सकते हैं।
Raushan kumar
#13. वो भी एक जवान हैं... 👨🌾
वो मौसम की हर परिस्थिति को जानता हैं, अकाल में भी वो हार नहीं मानता हैं,
अगर न हो जमीं पे पानी तो वो पसीने की नदियाँ बहाता हैं,
घुटने नहीं टेकता उसका हौसला हिमालय सा चट्टान हैं, हाँ वो किसान हैं इस देश का वो भी एक जवान हैं.....
फसलों की उपज से वो अपने घर को चलाता है, अपने परिवार के साथ साथ पशु पक्षियों को भी दाना खिलाता हैं,
नहीं हैं उसके पास दिव्य शक्ति कोई फिर भी वो हमारे लिए भगवान हैं, हाँ वो किसान हैं इस देश का वो भी एक जवान है.....
उसकी फसलों की कुछ ज्यादा कीमत नहीं हैं,इसका विरोध करने का अब उसके पास हिम्मत नहीं हैं,
सरकार ने उसको दबाया हैं अपने हीं घर में सताया है, वें भूल रहें हैं कि,
उसके हाथों में हीं देश का कमान हैं, हाँ वों किसान हैं इस देश का वो भी एक जवान हैं.....
फाड़ कर छाती वो जमीन का सोना उगलवाता हैं वर्षा की आश में तपती धुप में पैर जलाता है,
नहीं रहा उसको अब उम्मीद किसी से दे रहा वो खुद को बलिदान (आत्महत्त्या) हैं,
हाँ वो किसान हैं इस देश का वो भी एक जवान हैं.....
नही हैं उनके सीने पर कोई पदक फिर भी चेहरे पर रहता हैं एक चमक,
वो अंधेरी रात में जुगनू सा चमकता एक इंसान हैं वो शेर ए हिंदुस्तान हैं,
हाँ वो किसान हैं इस देश का वो भी एक जवान हैं....!
:- रौशन कुमार केसरी
24.01.2026
Awantika Palewale
હવે અર્થોની પળોજણથી અમે પાર ઉતરી ગયા છે,
શબ્દોની બધી માયાજાળથી અમે પાર ઉતરી ગયા છે.
હતી જે વાચામાં ધાંધલ, હવે એ શાંત થઈ ગઈ છે,
કહેવાતા બધા જ વિવાદથી અમે પાર ઉતરી ગયા છે.
નથી કોઈ અપેક્ષા કે હવે કોઈ મનાવે આપણને,
દુનિયાના ખોટા વટ-વહેવારથી અમે પાર ઉતરી ગયા છે.
કિનારો શોધતા'તા જે સતત ભીતરના દરિયે,
એ ડૂબવાના ડર અને મઝધારથી અમે પાર ઉતરી ગયા છે.
હવે તો બસ ઉજાસ છે, કોઈ ભાષાની ક્યાં જરૂર છે?
અંધારાના એ જૂના પડઘારથી અમે પાર ઉતરી ગયા છે.
M K
जी नहीं ,,,
अब कोई बहाना नहीं सुनूंगी,,,
क्योंकि मुझे तुम पर भरोसा नहीं है,
मेरे आंखों में पानी तो है,
लेकिन तेरी वजह का कोई कहानी नहीं है...!!!!
- M K
M K
उसकी मोहब्बत ही झूठी थी,
मेरे सच्चे दिल को तोड़ दिया,,,
जा बदल जा तुम्हारी फ़िदरत ही थी बदलना,
हमने भी अब मोहब्बत करना छोड़ दिया,,,
- M K
M K
उसकी मोहब्बत ही झूठी थी,
मेरे सच्चे दिल को तोड़ दिया,,,
जा बदल जा तुम्हारी फ़िदरत ही थी बदलना,
हमने भी अब मोहब्बत करना छोड़ दिया,,,
- M K
Nilesh Rajput
अब वो नहीं वो ही चाहिए।♥️
kattupaya s
Goodnight friends..sweet dreams
S K I N G
हमें तलाश थी इक ऐसे शख़्स की उम्र भर जो भीड़ में हो, मगर भीड़ जैसा नहीं है।
Md Siddiqui
26 जनवरी का यह पावन अवसर हमारे देश की शान और हमारे लोकतंत्र की ताकत का प्रतीक है। आप सभी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
Md Ibrar Pratapgarhri
Lakshmanarao Kasarapu
"FEELINGS ARE THE ESSENCE OF YOUR LIFE"<br />
CHAPTER -1 <br />
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DISCOVERING THE POWER OF EVERY EMOTION.<br />
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Introduction: Your secret inner language<br />
Every day, people feel waves of fear, joy, anger, shame, love, excitement, and sadness—but most were never taught what these feelings really mean.<br />
Instead, many grew up hearing “don’t cry,” “be strong,” or “stop overreacting,” so they learned to hide emotions instead of listening to them.<br />
This chapter invites the reader to do something different: to see every emotion as a secret inner language that is trying to protect, guide, and energize their life.<br />
Imagine emotions like colors in a rainbow.<br />
If life only allowed one color—only happiness—everything would look flat and fake. <br />
In the same way, without the full range of feelings, a person’s life becomes narrow and lifeless, even if they smile on the outside.<br />
Emotions are not enemies, they are messengers<br />
Modern emotional psychology explains that emotions are signals created by the brain to help a person respond to what is happening around and inside them.<br />
For example, fear warns about danger, anger signals that a boundary was crossed, sadness shows that something valuable was lost, and joy tells the person “this is good, grow more of this.”<br />
When someone treats emotions like enemies—trying to crush or ignore them—those messages get buried but not erased.<br />
Buried feelings often return as stress, overthinking, body tension, or sudden angry outbursts, which makes life feel heavier and more confusing.<br />
Instead, when a person pauses and asks, “What is this emotion trying to tell me?”, they move from being controlled by feelings to being guided by them.<br />
This simple question begins to transform fear into wisdom, anger into clarity, sadness into healing, and joy into motivation.<br />
The hidden cost of running away from feelings<br />
Many adults and teens use distraction to escape their feelings—scrolling, binge watching, overeating, or constant busyness.<br />
On the surface it looks like relaxation, but inside, unprocessed emotions quietly build pressure like steam in a closed cooker.<br />
Research shows that constantly suppressing emotions is linked with more anxiety, depression, and poorer mental health.<br />
The mind spends energy trying not to feel, which leaves less energy for creativity, focus, and joy.<br />
Over time, people who avoid feelings may say “I feel empty” or “I don’t know who I am,” because they have been disconnected from their own emotional truth.<br />
They may react strongly to small triggers, because old, unhealed emotions keep returning to the surface looking for attention.<br />
Acceptance: The door to emotional freedom<br />
The good news is that emotional freedom does not start with changing feelings; it starts with accepting them.<br />
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•
Amrita Singh
मैं एक साधारण-सी लड़की हूँ,
सजने-संवरने का हुनर नहीं मेरा।
चेहरे पे वो चाँद-सा नूर नहीं,
साँवलेपन की नर्मी है—मैं अपनी राह में स्थिर हूँ।
भीड़ की रौनक मुझे भाती नहीं,
ख़ामोशी में मेरी दोस्ती बसती है।
मेरी आँखों में वो चमक नहीं,
जो हर ख़्वाब में तुम तलाशते हो।
मेरी नज़र बस सुकून की आदत में डूबी है,
तो फिर क्यों वक़्त ज़ाया करते हो मेरे पीछे?
जाओ, ढूँढ लो वो चाँद-सा चेहरा कहीं,
इस दुनिया में हुस्न की कोई कमी नहीं।
तुम्हें मिल जाएगी वो नूर वाली,
आँखों में जादू लिए कोई और हसीन।
और मैं रहूँगी अपनी सादगी की छाँव में,
ख़ामोशी की रौशनी में, अपने रंगीन जीवन में।
writer by अमृता सिंह ✍🏽
Neha kariyaal
जिंदगी का मतलब हर बार जीतना नहीं होता,
कभी कभी ज़िंदा रहना होता है और
सांस लेना भी जीतना ही होता है।।
Vedanta Life Agyat Agyani
The human being is born outward,
and searches outward for itself.
Searching, wandering, circling the world—
it finally returns
to the subtle seed
from which the journey began.
Leaving home
to gain something,
to become something,
to prove something—
yet nothing remains in the hands.
When exhaustion silences the search,
it becomes clear:
the journey itself was home.
The world is searching
for a permanent happiness,
a fixed destination
where joy, safety, comfort
might last forever.
But nothing stays.
Because permanence does not exist outside.
On the journey
no god is found,
no deity appears,
no final destination waits.
First arises the illusion:
“I am the doer,
I am becoming greater.”
Then comes the second dream:
heaven, liberation, God.
And finally
these too fall away.
Then it is seen clearly—
Life itself is truth.
Life itself is God.
Life itself is liberation.
No ruler sits above,
no separate witness watches.
Living itself is the path.
Living itself is the answer.
When life is truly lived,
the future dissolves,
time grows thin,
age loses meaning.
Pain and sorrow
belong to the language of tomorrow.
For one who lives,
everything is already here.
To acquire is foolishness.
To achieve is foolishness.
To rest inside desire
is the deepest foolishness.
The present alone is real.
This alone is living.
Where life flows,
existence supports it—
because this is a matter of life itself,
not of any god.
Only one condition exists:
to live.
In living,
home is found,
wandering ends.
Then there is no age,
no time—
only childhood remains.
Eternal childhood
░V░e░d░a░n░t░a░ ░2░.░0░ ░L░i░f░e░
░=░ ░F░r░e░e░ ░f░r░o░m░ ░w░o░r░d░s░,░
░l░i░b░e░r░a░t░e░d░ ░f░r░o░m░ ░c░o░n░c░e░p░t░s░,░
░a░n░d░ ░i░n░ ░d░i░r░e░c░t░ ░c░o░n░t░a░c░t░ ░w░i░t░h░ ░l░i░f░e░.░
Kamini Shah
કેસરી ધવલ હરા રંગથી
લખાયેલી તિરંગાની કહાની
શહાદતને વરેલા જવાર્મંદોની
ઓળખ રહી સદા હિંદુસ્તાની…
-કામિની
Anup Gajare
पल्खा पल्खा
____________
पल्खा पल्खा
ओ मेरी पल्खा
कैसे कैसे
हूँ दूर मैं कैसे…
छोड़ूँ छोड़ूँ
कोई बातें
कोई मुलाक़ातें
पल्खा पल्खा
ओ मेरी पल्खा
तेरे तेरे
बिन तेरे
अधूरे अधूरे
हैं ख़्वाब अधूरे
न कोई
न कोई
भटके से किनारे
लहरें लहरें
अपनी उम्र भागे
समुद्र से पानी
पानी से पानी
नीला पल्खा
नीला पल्खा
छूते रास्ते
मुड़ी मंज़िलें
गुज़रे गुज़रे
ज़माने ज़माने
पल्खा पल्खा
कोई जादू
कोई खिलौना
टूटा सहारा
छूटा किनारा
अंधा दीवाना
खाली मकान
खुला मकान
टूटा मकान
घर था कभी ये
ये था कभी घर
पल्खा पल्खा
सो जा मेरी
नींद, सो जा
अब नहीं दुनिया
भटकी राहें
दूर निगाहें
कोई नहीं
वहाँ
वहाँ नहीं कोई
शैतान, मुसीबत
बुरी बला कोई
छूती नहीं तुझे
छूती नहीं मुझे
टूटी सड़क को
फिर कोई कैसे तोड़े
पल्खा पल्खा
सो मत जाना
कोई नहीं यहाँ
कोई नहीं यहाँ
तेरे सिवाय
तेरे सिवाय
मेरे सिवाय, मेरे सिवाय
कोई है क्या
नहीं है क्या
जुगनू बुझ गए
मकान टूटे
खाली सड़कें
भटके मुसाफ़िर
कोई सहारा
मेरा तेरा
तेरा मेरा
बुझते दिए को
आख़िरी दावत
किसने छोड़ी
मेरी उम्र
है क्या, क्या है
क्यों से आगे
अनंत के आगे
पीछे कोई
पीछे कोई
नहीं, नहीं
______________________________________________
Shraddha Panchal
ज़िंदगी की किताब का ,
“ एक पन्ना”
यूही ऐसा ही रह गया ,
नहीं पढ़ने की हिम्मत हुई,
और
नहीं उसे पलटने की❤️
Sohagi Baski
শেষ পৃষ্ঠার ডায়েরি নোট
আজ মনটা ভারী, অথচ কারণটা ঠিক ধরতে পারছি না। সবাইকে খুশি রাখতে রাখতে কোথাও গিয়ে নিজেকেই হারিয়ে ফেলেছি। কথা বলি, হাসি, দায়িত্ব নিই—তবু শেষে এসে দেখি আমি একা। মনে হয়, আমি কি তবে যথেষ্ট নই? নাকি আমার ভালোবাসার ভাষাটা কেউ বোঝে না? বারবার হৃদয় ভাঙে, প্রশ্নগুলো জমতে থাকে, উত্তর আর আসে না। আজ কোনো ব্যাখ্যা চাই না, কোনো উপদেশও না—শুধু চাই কেউ আমাকে নিঃশব্দে শক্ত করে জড়িয়ে ধরুক, যেন এই ক্লান্ত মনটা একটু কাঁদতে পারে। এতটুকু চাওয়া কি সত্যিই খুব বেশি?
এরপর আর কিছু চাওয়ার সাহস থাকে না। প্রশ্নগুলোও ধীরে ধীরে চুপ করে যায়, শুধু একরাশ নীরবতা বুকে জমে থাকে। বুঝতে পারি, সব কষ্টের নাম বলা যায় না, সব অভাবের ভাষা হয় না। কাউকে দোষ দিতেও ইচ্ছে করে না, নিজেকেও না—তবু এক ধরনের ক্লান্তি চারপাশ ঘিরে ধরে। যেন অনুভবগুলো বোঝা হয়ে গেছে, বহন করতে করতে হাঁপিয়ে উঠেছি। আজ আর অভিযোগ নেই, প্রত্যাশাও নেই—শুধু এই স্বীকারোক্তি যে আমি ভেঙে পড়েছি, নিঃশব্দে, গভীরভাবে। যদি কেউ না-ও আসে, তবু এই সত্যটা লিখে রাখি—আমি কষ্ট পেয়েছিলাম, অনেকটা, এবং একাই।
সব কথা আর লেখা হয় না। কিছু অনুভূতি শেষ পর্যন্ত বয়ে নিয়ে চলতে হয়, কাউকে না জানিয়ে। আজ এই শেষ পাতায় এসে বুঝি, আমি অনেক আগেই ক্লান্ত হয়ে পড়েছিলাম—হাসতে হাসতে, মানিয়ে নিতে নিতে। কেউ খেয়াল করেনি, আমিও আর জানানোর চেষ্টা করিনি। প্রত্যাশাগুলো একদিন একদিন করে চুপ করে গেছে, প্রশ্নগুলো উত্তরহীন থেকে গেছে। দোষ দেওয়ার মতো কাউকে আর খুঁজে পাই না, নিজেকেও না। শুধু এই স্বীকারোক্তিটুকু রেখে যাই—আমি ভেঙে পড়েছিলাম, গভীরভাবে, নিঃশব্দে। যদি কেউ কোনোদিন এই পাতাটা পড়ে, জানুক—এই নীরবতার ভেতরেও একসময় আমি খুব কষ্ট পেয়েছিলাম।
Sohagi Baski
"শেষ পৃষ্ঠার ডায়েরি নোট"
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আজ মনটা ভারী, অথচ কারণটা ঠিক ধরতে পারছি না। সবাইকে খুশি রাখতে রাখতে কোথাও গিয়ে নিজেকেই হারিয়ে ফেলেছি। কথা বলি, হাসি, দায়িত্ব নিই—তবু শেষে এসে দেখি আমি একা। মনে হয়, আমি কি তবে যথেষ্ট নই? নাকি আমার ভালোবাসার ভাষাটা কেউ বোঝে না? বারবার হৃদয় ভাঙে, প্রশ্নগুলো জমতে থাকে, উত্তর আর আসে না। আজ কোনো ব্যাখ্যা চাই না, কোনো উপদেশও না—শুধু চাই কেউ আমাকে নিঃশব্দে শক্ত করে জড়িয়ে ধরুক, যেন এই ক্লান্ত মনটা একটু কাঁদতে পারে। এতটুকু চাওয়া কি সত্যিই খুব বেশি?
এরপর আর কিছু চাওয়ার সাহস থাকে না। প্রশ্নগুলোও ধীরে ধীরে চুপ করে যায়, শুধু একরাশ নীরবতা বুকে জমে থাকে। বুঝতে পারি, সব কষ্টের নাম বলা যায় না, সব অভাবের ভাষা হয় না। কাউকে দোষ দিতেও ইচ্ছে করে না, নিজেকেও না—তবু এক ধরনের ক্লান্তি চারপাশ ঘিরে ধরে। যেন অনুভবগুলো বোঝা হয়ে গেছে, বহন করতে করতে হাঁপিয়ে উঠেছি। আজ আর অভিযোগ নেই, প্রত্যাশাও নেই—শুধু এই স্বীকারোক্তি যে আমি ভেঙে পড়েছি, নিঃশব্দে, গভীরভাবে। যদি কেউ না-ও আসে, তবু এই সত্যটা লিখে রাখি—আমি কষ্ট পেয়েছিলাম, অনেকটা, এবং একাই।
সব কথা আর লেখা হয় না। কিছু অনুভূতি শেষ পর্যন্ত বয়ে নিয়ে চলতে হয়, কাউকে না জানিয়ে। আজ এই শেষ পাতায় এসে বুঝি, আমি অনেক আগেই ক্লান্ত হয়ে পড়েছিলাম—হাসতে হাসতে, মানিয়ে নিতে নিতে। কেউ খেয়াল করেনি, আমিও আর জানানোর চেষ্টা করিনি। প্রত্যাশাগুলো একদিন একদিন করে চুপ করে গেছে, প্রশ্নগুলো উত্তরহীন থেকে গেছে। দোষ দেওয়ার মতো কাউকে আর খুঁজে পাই না, নিজেকেও না। শুধু এই স্বীকারোক্তিটুকু রেখে যাই—আমি ভেঙে পড়েছিলাম, গভীরভাবে, নিঃশব্দে। যদি কেউ কোনোদিন এই পাতাটা পড়ে, জানুক—এই নীরবতার ভেতরেও একসময় আমি খুব কষ্ট পেয়েছিলাম।
Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz
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{{ अनकहे जज़्बातों का सफ़र }}
अजनबी हो तुम, मगर दिल को न
जाने क्यों अपने लगते हो,
मुसाफ़िर हूँ मैं, और तुम थकी हुई
राहों का कोई सपना लगते हो,
तुमने जब जी कहा तो एक आदर
की दीवार खड़ी कर दी,
मगर मैंने चाहा था, कि वो सादगी
हो, जो रूह से जुड़ी रही,
मैं मुसाफ़िर, जिसकी कोई मंज़िल
नहीं, बस चलते जाना काम है,
पर तुमने हक़ से नाम जो दिया
अब वही मेरी नई पहचान है,
तुम्हारी उस ज़िद में, एक मासूम
सा अधिकार नज़र आता है,
जैसे कोई सूखा पत्ता, अचानक
सावन की बौछार पा जाता है,
एक नाम (P) भी आया जो लबों
तक आकर ठहर गया,
पुराना ज़ख्म था कोई जो फिर से
आँखों में उभर गया,
मैं तुम्हें पुकार न सकूँगा, उस
नाम से कुछ यादें पुरानी हैं,
मगर तुम्हारे लिए मेरे पास, एक
नई और पाक कहानी है,
तुम ज़िद्दी ही सही पर तुम्हारी ये
ज़िद दिल को छू जाती है,
मेरी वीरान सी मुसाफ़िरी में एक
मीठी सी धुन जगाती है,
सुनो हँसती रहना तुम कि तुम्हारी
हँसी ही मेरा सुकून-ए-क़ल्ब है,
मैं इक मुसाफ़िर ही भला, पर
तुम्हारा ये साथ ही मेरा अब सब है,
कोई रिश्ता हो न हो पर ये रूह का
गहरा साया है,
मैंने अपनी हर भटकन में, बस तुम
जैसा ही कोई पाया है…🤝😇
╭─❀🥺⊰╯
✤┈┈┈┈┈★┈┈┈┈━❥
#LoVeAaShiQ_SinGh😊°
⎪⎨➛•ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी°☜⎬⎪
✤┈┈┈┈┈★┈┈┈┈━❥
यूं ही बस एक ख्याल ऐसा भी..✍🏼😊
Bhavna Bhatt
નાનપણના તોફાન મસ્તી
Priya
wait for right time.....
Anil singh
"शहर का सबसे बड़ा बिजनेस टाइकून, आर्यन राठौर! 🏢 आख़िर क्या छिपा है उसके इस सख्त चेहरे के पीछे? 🎭
एक तरफ बोर्ड मीटिंग का तनाव और दूसरी तरफ घर में अपनों के तंज। जब सब सान्वी को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे थे, तब आर्यन का उसके पक्ष में खड़ा होना... क्या ये महज एक दिखावा है या उसकी नफरत की बर्फ पिघल रही है? ❄️➡️🔥
अपनी राय कमेंट्स में बताएं! 👇💬"
Anil singh
"रिश्ता भले ही एक 'सौदा' था, पर सान्वी के संस्कार बिकाऊ नहीं थे। 👰 उस आलीशान किचन की चमक-धमक में जहाँ शीतल चाची के शब्दों में ज़हर था, वहीं सान्वी के हाथों में उसकी माँ का सिखाया प्यार था। ❤️
स्वाद अमीरी से नहीं, साफ नीयत से आता है। आज सान्वी ने अपनी पहली परीक्षा तो पार कर ली, पर क्या वो इस पत्थर के महल में अपना दिल बचा पाएगी? 🏰🥀
पढ़िए 'सौदे का सिंदूर' का नया अध्याय! 📖✨"
Anil singh
"स्वाद अमीरी या गरीबी से नहीं, बल्कि नीयत और प्यार से आता है। आज सान्वी ने साबित कर दिया कि महल चाहे कितना भी बड़ा हो, दिल जीतने के लिए सादगी ही काफी है।"
पढ़िए 'सौदे का सिंदूर' का अगला भाग,
सिर्फ मातृभारती पर!
Ashish jain
नई कहानी नया नया उपन्यास
चेकपोस्ट: चाणक्य
एक बूढ़े कुत्ते की जबरदस्ती को कहानी
फनी और मस्त
प्रस्तावना (Introduction)
"संसार में कई प्रकार के कर (Tax) होते हैं—आयकर, संपत्ति कर, और जीएसटी। लेकिन २० फुट की उस धूल भरी सड़क पर एक ऐसा 'अघोषित कर' चलता है जिसे दुनिया 'आशीष-चाणक्य बिस्किट लेवी' के नाम से जानती है।
यह कहानी एक ऐसे असाधारण जीव की है, जिसने बुढ़ापे को मजबूरी नहीं, बल्कि 'मजबूत वसूली' का हथियार बनाया है। 'चेकपोस्ट चाणक्य' कोई साधारण श्वान नहीं है; वह कूटनीति का वह शिखर है जहाँ पहुँचकर बड़े-बड़े अर्थशास्त्री भी बिस्किट का पैकेट खोल देते हैं। इस प्रस्तावना का उद्देश्य पाठक को उस मानसिक दबाव से अवगत कराना है, जिससे आशीष जैन रोज़ गुज़रते हैं। यह दास्तान है उस मूक समझौते की, जहाँ एक तरफ आशीष की अटूट उदारता है और दूसरी तरफ चाणक्य की 'ऑस्कर-विजेता' नौटंकी। आइए, प्रवेश करते हैं बिस्किट और एक्टिवा के उस अनूठे संसार में, जहाँ नियम सिर्फ एक ही कुत्ता बनाता है।"
Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz
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खुली ज़ुल्फें, माथे पर बिंदी, और
उस पर ये कातिल अदा,
उफ़ ये हाथ में चाय का प्याला
मतलब जान लेने का नया तरीका?
नज़रें मिलीं, तो धड़कन रुकी, जो
मुस्कुराए तो कयामत होगी,
इतना सितम न ढाओ मुझ पर
वरना शहर में मेरी शहादत होगी.🙈
╭─❀🥺⊰╯
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#LoVeAaShiQ_SinGh😊°
⎪⎨➛•ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी°☜⎬⎪
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Paagla
https://youtube.com/shorts/zoKrnzN5Q9w?si=418_Qk_qBitsDE15
M K
MB मतलब मातृभारती,
ये ऐप लिखने से ज्यादा,
फेकू ऐप हो गया है ,
लोग कुछ भी अपने बारे में झूठ बोलते हैं,
खुद को ips, doctor, chat gpt का use कर
खुद को writer, storytelling कुछ भी ।
क्या मजाक हो रहा है यहां भाई ??😁
Mb means फेकू ऐप कुछ भी लिखो बोलो सब सही है 😁😁
Raa
Aap sab ko republic day ki subh kamna
M K
इंसान कोई भी हो सामने,
उससे मोहब्बत चाहे कितना भी गहराई से क्यों न हो?
एक बार भरोसा टूट गया तो,
चाह कर भी यकीन नहीं होता।।
जैसे पेड़ से पता एक बार टूट जाए तो,
जुड़ नहीं सकता है,
वैसे ही मेरा भरोसा तुम पर था कभी....!!!
- M K
M K
झूठ के बुनियाद पर मुझसे रिश्ता जोड़ने चला था,
आखिरकार झूठ का लिबाज़ कब तक सच छुपा सकता है,,,
एक न एक दिन हटना ही था ।।।
- M K
hsc
Happy 77th Republic Day to all respected indian
Archana Singh
कहां वो सच्चा संविधान हैं ...!
जिसके लिए ये जग देता था..!
विश्व गुरु का मान हैं ...!
कहां वो भारत में श्रेष्ठ कर्म की विधि-विधान ..!
यहां तो बस लिंग-भेद पर होता सदा पक्षपात हैं !
मुखौटा लगाए घूम रहे हैं ...
यहां स्वत: ही कंस-दुशासन का राज हैं !
सम्मान नारियों का यह झूठी अफ़वाह हैं !
बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ ... !
यह एक छल और आडंबर हैं !
हक़ की बात जहां आए ,
पुरुष प्रधान यह स्वर्णित हो जाएं !
अब भी कहते हो , गणतंत्र दिवस मनाएंगे ...!
और उनकी नीतियों की अवहेलना हर बार कर जाएंगे !
आओ नया संविधान बनाएं ...
सदाचार और सद्विचार का आगाज़ फैलाएं ...!
जहां हर नारी भारत माता हो ....
और सम्मान का अधिकारी हो ...!
तब होगा सच्चा गणतंत्र दिवस ...
तब सच्चा गणतंत्र दिवस ....!!
स्वरचित : अर्चना सिंह ✍🏻
धन्यवाद दोस्तों 🙏🏻🙏🏻💐💐
Balkrishna patel
Happy Republic day
Gautam Patel
ખોડીયાર જયંતિ
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