Gujarati Whatsapp Status | Hindi Whatsapp Status
SHIVA

સંબંધ ભલે પેહલા જેવો હોય કે ના હોય, ભલે બધું બદલાઈ જતું હોય, પણ જે યાદો હોય છે એ નથી બદલાતી. I JUST LOVE TO BE IN THERE ALWAYS. WE BOTH ARE CHANGED EXPECT THE MEMORIES..

kattupaya s

Good evening friends.. have a nice time

Abhishek Kunehadiya

इंतजार

S A Y R I K I N G

मैं चाह रहा तुम्हारे साथ इतना बुरा हो कि तुम मर जाओ और किसी को ख़बर ना हो

cat

यूं रास्तों को क्यूं ताकता है तू, मैं पूछती हु .... " कोई आने वाला है क्या..?? " written by me 🥀🥀

cat

यूं रास्तों को क्यूं ताकता है तू, मैं पूछती हु .... " कोई आने वाला है क्या..?? " written by me 🥀🥀

Paagla

https://youtube.com/shorts/I4g_nnzD0Hc?si=RsBgaK8y3eYsGChk

Arun Mishra

प्यार जितना अधिक खुश देता है , उससे ज़्यादा उसे खोने का डर दर्द देता है , प्यार करना जितना आसान होता है, उससे ज्यादा तो उसको बुलाने में लगता है , पहले तो मैं लोगों को देखकर बोलता था कि नहीं होता है , पर जब आज उस स्थिति में जब मैं मुझे डर लग रहा है ,सोचकर जान निकल जाती है प्लीज मुझे इस दर्द से निकलने का कोई तरीका दे

Hayat

https://www.instagram.com/reel/DTchAcJEa2o/?igsh=MTdnMnRzZm1ldGwyZw==

Hayat

एक नाव में पैर पसारे.. ऐसे कैसे वो भी प्यारे हम भी प्यारे ऐसे कैसे... 😔😔😂😂 - Hayat

aakanksha

तेरा इश्क़ मेरे हर दर्द की दवा बन गया, तेरे आने से ही मेरा हर लम्हा ख़ुशनुमा बन गया। जो सन्नाटा था रूह में, वो भी मुस्कुरा उठा, तेरे होने से ही मेरा हर पल हसीं बन गया।

Dhamak

​શિયાળાની એક આરામદાયક સાંજે, મારા વીચારો😊 ​"ખરેખર, જીવનની સાચી શાંતિ નાની-નાની પળોમાં જ છુપાયેલી હોય છે. ​શિયાળાની ઠંડી સાંજ હોય, બારીની બહાર શીતળ પવન લહેરાતો હોય, રૂમમાં ઝીણી કમ્ફર્ટેબલ લાઈટનો મીઠો પ્રકાશ હોય અને હાથમાં ગરમાગરમ મસાલા ચાનો કપ હોય... સાથે ગમતું પુસ્તક અને પોચા,નરમ ઓશીકાનો સાથ હોય, ત્યારે મનને સાચો આરામ મળે છે. ​બસ, થોડા ધીમા પડો, ઊંડો શ્વાસ લો અને આજની આ સુંદર પળને માણી લો; આવતીકાલની ચિંતાને થોડીવાર માટે થોભાવી દો." (મારા આ વિચારો આજની ગુલાબી ઠંડીને નામ) લી. ઢમક

Anup Gajare

वृत्त कहानी – 1 शहर के बाहर निर्वात-सी सुनसान सड़क पर गाड़ी धीमे चल रही थी। काले रंग का वाहन अंधकार से ही पैदा हुआ लग रहा था। रास्ते के दोनों तरफ घने पेड़ों के पत्ते हवा से लहरा रहे थे। फुटपाथ पर धूल थी। वहाँ से दिन में भी कोई नहीं गुजरता था। जगह ही ऐसी थी। खेतों का इलाका पीछे छूट चुका था। अब माहौल में मनुष्य के होने की संभावना न के बराबर थी—सिवाय गाड़ी में बैठे उस मनुष्य के। क्या कर रहा था वह इस सन्नाटे में? बियाबान सड़कों पर सियाह गाड़ी में इस तरह के वातावरण में कोई यूँ ही तो नहीं घूमता। पर उसका वहाँ होना इस बात की चुगली कर रहा था कि कुछ तो हुआ था—ऐसा कुछ, जो भीतर तक बेचैन कर दे। नहीं तो उसके यहाँ होने की कोई वजह ही नहीं थी। पेशे से वह आदमी इस शहर का कमिश्नर था। दिखने में न तो बहुत बूढ़ा, न ही बहुत जवान। चौकोर चेहरा, धँसी हुई आँखें, मद्धम नाक, गालों पर गड्ढे—ये सब इस बात की निशानी थे कि कभी बहुत बड़े रोग से उसका सामना हुआ था—रोग या… बाल संवारे हुए थे। मूँछों को ताव नहीं दिया था; वे बस अपनी जगह थीं। निचला होंठ थोड़ा बड़ा था—यही वजह थी कि ऊपर का होंठ थोड़ा छोटा नजर आता। ऐसा लगता, मानो उसने अपने निचले होंठों में पान दबाकर रखा हो। उसका नाम विलास सारंगी था। कद-काठी न तो बहुत पतली थी और न ही वह इंसान हट्टा-कट्टा था। विलास लेदर की जाड़े वाली जैकिट से हमेशा खुद को ढके रखता था। नीचे खाकी पैंट होती और गले में लाल चौकोनों की लकीर वाला पंचा लटका रहता। सारंगी अब तक विवाहशुदा नहीं था। शादी करने या न करने का कोई खास कारण नहीं था—बस हुई नहीं थी। और अब तो कोई सवाल ही नहीं उठता था कि इस तमाम झमेले में वह फँस जाए। लेकिन अगर सही उम्र में विलास सारंगी शादी करता, तो उसकी संतानें वर्तमान में ठीक बीस साल की होतीं। उसने शादी नहीं की क्योंकि उसके फक्कड़ पिता ने कभी विवाह नहीं किया था। पिता गटर या नाली में पड़े रहते। उनके शरीर से बदबू आती—मुँह से और भी उग्र, बासी बू। वे कभी नहाते नहीं थे। पिता ने विलास को अपना ‘सारंगी’ नाम दिया था। बाकी ‘विलास’ नाम तो किसी पान के ठेलेवाले भैया ने उसे चिपका दिया था। उसके पिता को विलास सूखी नदी के पास रेत पर पड़ा हुआ मिला था। किसी मांत्रिक की अधूरी साधना में, नदी के ठीक बीचोबीच, गांजे से बने वृत्ताकार गोले में एक नवजात बच्चा बिलग रहा था। मांत्रिक अपनी साधना अधूरी छोड़ चला गया था—चला गया था या भाग गया था, कहना मुश्किल था। पिता ने नवजात बच्चे को उठाया और गंदी नाली के पास चले आए। उन्होंने उसे पाला—या कहना सही रहेगा कि विलास अपने आप ही पल गया। पिता नहीं जानते थे कि वह मांत्रिक उस नवजात बच्चे, यानी विलास, को कहाँ से उठाकर लाया था। मांत्रिक बहुत गांजा फूँकता था। गाँव में भीख माँगता, खाना खाता—और फिर गांजा फूँकता। शायद इसलिए विलास के शरीर से तीव्र गांजे की गंध आती थी, पर नाली के काले पानी से वह हमेशा बुझ जाती। पूरे गाँव में कोई भी उस मांत्रिक को टोकता नहीं था। गाँव उससे डरता था। मांत्रिक हर पेड़ के इर्द-गिर्द गांजे से गोल वृत्त बनाता। फिर वह पेड़ सूखने लगता। नदी भी शायद इसी वजह से सूखी थी। यह मंत्र फूँकने वाला गाँव में कहाँ से आया था—किसी को पता नहीं था। धीरे-धीरे विलास के पिता जैसे और भी लोग उसकी संगत में रहने लगे। वे सब गोलाकार बैठते, बीचोंबीच एक अलाव लगाते। उस आग से गांजे की तीव्र गंध गाँव के रसोईघरों से निकले सफेद धुएँ में मिल जाती। वे लोग काली गुड़िया के भीतर गांजा रखते। उन दिनों ऐसी ढेर सारी काली गुड़ियाँ गाँव के पेड़ों पर झूलती हुई दिखती थीं। ऐसे माहौल में ही विलास सोलह साल का हो गया। एक दिन मांत्रिक पीपल के वृक्ष पर चढ़ा था। वक्त रात का था। वहाँ कोई नहीं था। पता नहीं कैसे मांत्रिक का पैर फिसल गया और वह जमीन पर नहीं, बल्कि पीपल से सटे सिंदूर लगे पत्थर पर गिर गया। उसका खून पत्थर पर रिस रहा था। वह चीखा नहीं—गिरते ही उसने दम तोड़ दिया। लोग जमा हुए तो सबने देखा कि मांत्रिक की उँगलियाँ वृक्ष की सबसे ऊँची टहनी की ओर उठी हुई थीं—वहीं, जहाँ से वह गिरा था। शायद वहाँ कोई बैठा था। हवा में पैर हिलाती, किसी बच्चे-सी आकृति उस टहनी पर थी। गाँववाले उसे देखकर सिहर गए। किसी ने पड़ताल नहीं की कि वह आकृति कौन थी। उस रात के बाद सब कुछ जैसे ठंडा पड़ गया। गाँव में अब किसी भी पेड़ के इर्द-गिर्द वृत्त दिखाई नहीं देते थे। धीरे-धीरे पेड़ों की शाखाओं पर लटकी काली गुड़ियाँ भी कम होती गईं। फिर एक दिन ऐसा आया कि एक भी उल्टी लटकी काली गुड़िया किसी ने नहीं देखी। जब विलास सारंगी सोलह बरस का था, उसका गाँव गांजा-मुक्त हो गया था। यह इतना आसान नहीं था—विलास ही जानता था कि उसके पिता ने सब कुछ ठीक होने के लिए क्या किया था… तो यही था विलास सारंगी का अतीत। इस भूतकाल को कंधे पर लिए वह कैसे शादी करता? अगर करता, तो यकीनन बीस-इक्कीस साल के उसके बच्चे होते। सारंगी आज इसी वजह से बहुत अस्वस्थ था। किसी बीस साल के छात्र ने उससे सवाल किया था। छात्र उसके न हुए बेटे की उम्र का था—अगर उसकी अपनी औलाद होती, तो क्या उसका भी यही सवाल होता? उस छात्र ने सीधे पूछा था—“सर, गांजा पीनेवाले या बेचनेवाले लोगों तक नाबालिग कॉलेज के लड़के भी पहुँच जाते हैं, तो फिर पुलिस क्यों नहीं पहुँच पाती? ये सब बंद क्यों नहीं होता? क्या हम इसी चक्र में फँसे रहेंगे?” सवाल ठीक निशाने पर बैठा था। इसके बाद उसे चक्कर आया। कुर्सी पर बिठाकर पानी दिया गया। भीड़ जमा हो गई—कोई कह रहा था बीपी बढ़ गया, कोई शुगर। विलास सारंगी की बेचैनी का यही कारण था। वही सवाल उसकी अंदरूनी हालत बिगाड़ रहा था। इसी वजह से वह इतनी रात गए इस बियाबान, निर्मनुष्य माहौल में भटक रहा था। कई दिनों की खोज के बाद उसे इस जगह के बारे में पता चला था। यह कोई साधारण जगह नहीं थी। पेड़ों की टहनियों पर नींबू-मिर्च वाली काली गुड़ियाँ उल्टी लटकी हुई थीं। रात के अंधकार में वे भयावह दिख रही थीं। लगभग हर पेड़ के इर्द-गिर्द गोलाकार वृत्त खींचे गए थे। यही वह जगह थी, जहाँ से शहर में बिकने वाला हजारों टन गांजा आता था। यहाँ भी वही हो रहा था, जो सालों पहले उसके गाँव में हुआ था। गाड़ी रोककर वह नीचे उतरा। अब विलास पैदल चल रहा था। उसके चमड़े के लाल जूतों की कोई आहट नहीं हो रही थी। ढलान से उतरते हुए वह करंजी के पेड़ के पास आ गया। उल्टी लटकी गुड़िया देखना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। तने की मटमैली जमीन पर वृत्त बना था—उसकी गोल रेखाएँ गांजे से खींची गई थीं। सारंगी के ओबड़-खाबड़ गाल तन गए। धँसी आँखों में विस्मय नहीं, बल्कि घृणा और गुस्सा था। उसका बड़ा होंठ थरथराने लगा। उसने गले में लटके लाल पंचे में राख भर ली। तेज बदबू हवाओं में फैल गई। “गांजा कहीं भी जाए, अपनी गंध कभी नहीं छोड़ता।” पिता के सालों पुराने शब्द उसके दिमाग को छलनी कर रहे थे। उसने करंजी के पेड़ के इर्द-गिर्द बने वृत्त को पंचे में लपेटकर गाँठ मार दी—यह करना उसके पिता ने ही सिखाया था। फिर वह पेड़ की टहनी पर चढ़ गया। उल्टी लटकी गुड़िया डर पैदा कर रही थी, लेकिन यह करना जरूरी था। जैकिट की जेब से कटर निकालकर उसने गुड़िया का सिर धड़ से अलग कर दिया। सन्नाटा। आठ सेकंड तक कोई हलचल नहीं। और फिर—एक चीख। कोई हाँफ रहा था, चीख रहा था। वह जो भी था, सारंगी की ओर बढ़ रहा था। लकड़बग्घे जैसी शिकारी हँसी करंजी के इर्द-गिर्द फैल गई। गहरी साँसें गर्म हवा में घुलकर आँखों में खौफ भर रही थीं। उसे अहसास हो चुका था कि उसकी जान ही नहीं, उससे कहीं ज्यादा कुछ दाँव पर था। कोई अज्ञात अस्तित्व घास को काँपता हुआ उसकी ओर बढ़ रहा था। डर अपनी जगह था, लेकिन उसे एक अधूरे काम के पूरा होने का सुकून भी मिल रहा था। वह जानता था कि उसके साथ क्या होने वाला है—कभी उसके पिता ने भी तो यही भुगता था। सारंगी तैयार था। लेकिन… आहट धीमी होती गई, जैसे वह अस्तित्व पीछे हट रहा हो। सारंगी के गले में हुक-सी अटक गई। उसे समझ नहीं आ रहा था—ऐसा तो नहीं होना चाहिए था। उसने काली गुड़िया का सिर काटा था, फिर वह पीछे क्यों हट रहा था? उसे अपने गंजेड़ी पिता याद आए। सालों पहले, नाली के पास, पिता ने गांजे से गोलाकार वृत्त बनाया था। उसमें आग जलाई और बीच में बैठ गए थे। सामने वही सिंदूर लगा पत्थर रखा था—जिस पर गिरकर मांत्रिक मरा था। पिता ने अपने खून से वृत्त बनाया और मंत्र बुदबुदाते हुए काली गुड़िया का सिर काट दिया। गंध फैली, जुबान कड़वी हुई, अंधकार छा गया। यह सब सोलह साल का विलास पेड़ के पीछे से देख रहा था। उसी रात पिता ने कहा था—“वह मांत्रिक बस जरिया था… असली चीज़ कुछ और थी।” और जाते-जाते उन्होंने बताया था—“विलास… वह मांत्रिक ही तेरा असली बाप था।” विलास फूट-फूटकर रो पड़ा। इसलिए नहीं कि उसके माने हुए पिता मर गए थे—बल्कि इसलिए कि उस रात पीपल की टहनी से मांत्रिक को धक्का देने वाला वही था। वही वह बच्चे-सी आकृति था। और अब उसे समझ आ गया था कि वह किस बोझ को ढोते हुए जी रहा है

Kajal Rathod...RV

अगर मैं खुद से ही झूठ बोल दूं... तो मेरा बोलना किस बात का।

Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz

https://youtube.com/shorts/QCMahf9E9Qg?feature=share

Narendra Parmar

मत किजिए हसिनाओं से इश्क़ इसमें है लड़कों को बहुत सा रिश्क ! मिल जाए इश्क़ तो, लड़के को बल्ले बल्ले 😄😅😂 नहीं तो फिर लडका पागल होकर 💔😫😫😩 दिवाल पर अपना सर पटके और दर दर भटके ।। नरेन्द्र परमार " तन्हा "

Bhavna Bhatt

આંગળી ચીંધવા વાળા

Nilesh Rajput

बड़ा अजीब सा इश्क़ निभा रही है वो, जिसे मंदिरों की राह कभी रास न आई, आज उसी मोहब्बत के सजदे में, वो मस्जिदों के दर तक झुक आई।

Heena Ramkabir Hariyani

एक शिक्षा भगवानने दी मुझे "स्त्री" बनाके, एक शिक्षा मेरी माँ ने दी अहमियत समझाके हीना रामकबीर हरीयाणी

Raju kumar Chaudhary

📘 पुस्तक समीक्षा: सवाल ही जवाब है पुस्तक का नाम: सवाल ही जवाब है विधा: विचारात्मक / दर्शन / आत्मचिंतन भाषा: हिंदी ✨ समीक्षा: “सवाल ही जवाब है” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि सोचने की एक नई दिशा है। यह किताब पाठक को सीधे जवाब नहीं देती, बल्कि ऐसे सवाल सामने रखती है जो पाठक को खुद के भीतर झाँकने पर मजबूर कर देते हैं। लेखक का मानना है कि जीवन के बड़े उत्तर बाहर नहीं, हमारे भीतर छिपे होते हैं—बस सही सवाल पूछने की ज़रूरत होती है। किताब की सबसे बड़ी खासियत इसकी सरल भाषा और गहरी बात है। हर अध्याय एक नए प्रश्न से शुरू होता है, जो धीरे-धीरे जीवन, समाज, रिश्तों, संघर्ष और आत्मा से जुड़ी परतें खोलता है। लेखक कहीं उपदेश नहीं देता, बल्कि पाठक को खुद सोचने की आज़ादी देता है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए बेहद खास है— जो जीवन में उलझन महसूस करते हैं जो खुद को बेहतर समझना चाहते हैं जो जवाबों से ज़्यादा सही सवालों की तलाश में हैं 📌 विशेष बिंदु: ✔️ छोटी-छोटी पंक्तियों में बड़ा अर्थ ✔️ आत्मचिंतन को प्रेरित करने वाली शैली ✔️ हर उम्र के पाठक के लिए उपयोगी ✔️ बार-बार पढ़ने योग्य पुस्तक ⭐ निष्कर्ष: “सवाल ही जवाब है” हमें यह सिखाती है कि जीवन में हर समस्या का हल तुरंत जवाब में नहीं, बल्कि सही सवाल पूछने में छिपा होता है। यह किताब सोचने वालों की किताब है, महसूस करने वालों की किताब है।

Raju kumar Chaudhary

📖 Book Review – सवाल ही जवाब है पुस्तक: सवाल ही जवाब है लेखक: [लेखक का नाम] वर्ग: विचार, आत्मचिंतन समीक्षा: “सवाल ही जवाब है” एक ऐसी किताब है जो आपको अपने जीवन के हर पहलू पर सोचने पर मजबूर कर देती है। यह किताब सीधे उत्तर देने की बजाय सही सवाल पूछने की कला सिखाती है। लेखक ने सरल और प्रेरक भाषा में ऐसे प्रश्न उठाए हैं जो आपके अंदर झाँकने और खुद को समझने की यात्रा शुरू कर देते हैं। यह पुस्तक हर उस व्यक्ति के लिए है जो जीवन में स्पष्टता, दिशा और आत्म-ज्ञान की तलाश में है। चाहे रिश्ते हों, संघर्ष हों या समाज की जटिलताएँ—यह किताब आपको सोचने और समझने की ताकत देती है। क्यों पढ़ें: जीवन के बड़े सवालों के जवाब खोजने के लिए आत्मचिंतन और सोच को मजबूत करने के लिए हर पढ़ने पर नए विचार और प्रेरणा पाने के लिए ⭐ अंतिम विचार: यह किताब केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि महसूस करने और अपने भीतर झाँकने की यात्रा है। “सवाल ही जवाब है” आपकी सोच को बदल सकती है और आपको अपने जीवन के सही सवाल खोजने में मदद कर सकती है।

Chaitanya Joshi

સ્વેટર, મફલરને ટોપી સાથે રખાવે. શિયાળો સૌના અંગેઅંગને ધ્રૂજાવે. ઠંડા પાણી થકી સર્વને એ અકળાવે. શિયાળો સૌના અંગેઅંગને ધ્રૂજાવે. મઝા અડદિયાની કેવી એ અપાવે, ઓળા રોટલા પણ થાળીમાં લાવે. જલદીથી પ્રભાતે પથારી ના મૂકાવે, શિયાળો સૌના અંગેઅંગને ધ્રૂજાવે. આનંદ પતંગોત્સવનો જે અપાવે, તડકો સૂરજનો તપીતપી ગરમાવે. કાળઝાળ ગરમી ગ્રીષ્મની ભૂલાવે. શિયાળો સૌના અંગેઅંગને ધ્રૂજાવે. વૃદ્ધ વડિલોને ઠંડી સહેજે ઠંગરાવે તોયે સ્ફૂર્તિ સૌના શરીરમાં સંચારે. ચોરે ચૌટે કેવાં તાપણાંઓ પ્રગટાવે, શિયાળો સહુના અંગેઅંગને ધ્રૂજાવે. - ચૈતન્ય જોષી. " દીપક " પોરબંદર.

Desai Pragati

किसीके लिए यादें बनना बुरी बात नहीं मगर, कोशिस रहे की वो यादें अच्छी हो..!

Shailesh Joshi

આપણી ક્ષણે ક્ષણનો હિસાબ ઈશ્વર પાસે હોય છે, અને ઈશ્વરનો હિસાબ તો એકજ છે કે, "જેવું વાવો તેવું લણો" - Shailesh Joshi

syed amina

💕✨ke log kehte hai tumhari dosti to kuch dinon ki mehmaan hai be tum kya jaano hamari dosti to zindai bhar ka ehsaas hai✨👀

Sonu Kumar

प्रेम Vs विवाह ; राजनीति Vs चुनावी राजनीति . सभी प्रेम कहानियों के साहित्यों में एक गलत बात को बार बार दोहराया गया है कि -- जमाना प्यार का दुश्मन है !! . यह बात ठीक नहीं है कि - ज़माना प्रेम का दुश्मन है। जमाने (जिसमें परिवार, समाज आदि शामिल है) को किसी भी व्यक्ति के प्रेम से कोई सख्त ऐतराज नहीं रहा है। जमाने को असली ऐतराज विवाह से होता है। . और जब जमाना किसी के प्रेम पर ऐतराज कर भी रहा होता है तो उसका यह ऐतराज इस वजह से होता है कि कहीं प्रेमी युगल प्रेम करते करते विवाह न कर बैठे !! . सलीम और मुगले आजम में इसीलिए ठन गयी थी कि सलीम अनारकली से निकाह करने पर अड़ गया था। यदि सलीम सिर्फ प्रेम तक सीमित रहता तो अकबर को कोई दिक्कत न थी। चाहे सलीम रोज नई अनारकली से प्रेम करें। . और सभी लैला-मजनूओं की दास्तानों का सार यही है। जब तक बात प्रेम तक सीमित है, तब तक जमाना अनदेखी करता है। पर जैसे ही जमाने को विवाह का अंदेशा होता, जमाना बीच में कूद जाता है। . यदि ज़माने को यह मुतमइन कर दिया जाए कि अमुक व्यक्ति सिर्फ प्रेम ही करेगा, और अपने प्रेमी से विवाह नहीं करेगा तो जमाना उसके प्रेम में बाधा नहीं बनता। उसे वह प्रेम करने की छूट दे देता है। . क्योंकि जमाना आपको अपनी सम्पत्ति के रूप में देखता है, और प्रेम से जमाने कोई साम्पत्तिक हानि नहीं होती। ज़माना चाहता है कि आप प्रेम किसी से भी करो और कितनो से भी करो, और करते रहो, किन्तु विवाह सिर्फ वहां करो जहाँ जमाना चाहता है। क्योंकि यदि आप जमाने के खिलाफ जाकर विवाह कर लेते है तो जमाने को लगता है कि उसने नियंत्रण खो दिया है। . ---------- . यही शर्त "राजनीति एवं चुनावी राजनीति" पर लागू होती है। . राजनीति में रुचि लेना, राजनैतिक विमर्श करना, जुलुस, प्रदर्शन, आन्दोलनो में हिस्सा लेना, सोशल मीडिया पर सरकार एवं राजनैतिक पार्टियों को कोसना आदि को जमाना (पेड मीडिया के प्रायोजक) निरापद प्रेम के रूप में देखता है। और जमाने को आपकी इस प्रेमल राजनैतिक रुचि से कोई ऐतराज नहीं। . जमाना सिर्फ इतना चाहता है कि -- जब चुनाव आये तो आप उनके द्वारा खड़ी की गयी पेड मीडिया पार्टियों (आरएसएस, कोंग्रेस, सपा, आपा, बसपा, अकाली आदि) को वोट देकर आ जाओ। बस !! . और वोट देने के बाद अगले 5 साल तक आप फिर से अपने अपने राजनैतिक प्रेम में खुद को व्यस्त कर सकते है। और ज़माना आपको कभी डिस्टर्ब करने नहीं आएगा। . जमाना (पेड मीडिया के प्रायोजक) सिर्फ इतना चाहता है कि आप जमाने द्वारा खड़ी की गयी पार्टियों के वोट काटने के लिए कोई नया राजनैतिक विकल्प खड़ा करने की दिशा में काम न करें। . यदि आपको नया राजनैतिक विकल्प चाहिए तो जमाना आपको नया राजनैतिक विकल्प (नवीनतम उदाहरण "आपा") बनाकर दे देगा। किन्तु कार्यकर्ता खुद से कोई राजनैतिक विकल्प खड़ा करने पर काम करे तो जमाने को ऐतराज है। . क्योंकि यदि मतदाताओं को पेड मीडिया पार्टियों के एजेंडे के खिलाफ काम करने वाला राजनैतिक विकल्प मिल जाता है तो जमाने द्वारा खड़ी पेड मीडिया पार्टियों को वोटो की हानि होगी। और वोट ही राजनैतिक जगत की वास्तविक सम्पत्ति है। . इस वजह से पेड मीडिया युवाओं को "चुनावी राजनीती" में आने से हतोत्साहित करता है। . राजनीती में रुचि लेने वाले ज्यादा से ज्यादा युवा यदि "चुनावी राजनीति" में आने लगेंगे तो चुनाव लड़ने वाले लोगो की संख्या बढ़ जाएगी। तब राजनीति से चुनावी राजनीति में शिफ्ट हुए ये कार्यकर्ता पेड मीडिया पार्टियों के खिलाफ नया राजनैतिक विकल्प खड़ा करने की दिशा में काम करने लगेंगे। . और युवाओं को चुनावी राजनीती में आने रोकने के लिए उन्होंने कितने कानूनी, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक लेंड माइन्स बिछा कर रखे है, इसे मैं लिखने जाऊँगा तो 1000 पृष्ठों में भी इसे समेटा नहीं जा सकता। . सार यह है कि -- कार्यकर्ताओ को "राजनीती एवं चुनावी राजनीति" के बीच के फर्क को समझना चाहिए। वे आपको राजनीति में रुचि लेने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करेंगे किन्तु चुनावी राजनीति में रुचि लेने से हतोत्साहित !! . -------- . और इस बात को अच्छे से नोट कर लें कि, जब भी कोई देश, समाज, राजनीति आदि की बात करने वाला कोई व्यक्ति या समूह इस मंशा से आपके पास आएगा कि आप राजनीती में रुचि ले किन्तु "चुनावी राजनीति" से दूरी बनाकर रखे तो वह हमेशा "जागरूक करने" की टर्म का इस्तेमाल करेगा !! . दरअसल, जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि - मैं लोगो को जागरूक कर रहा हूँ तो उसका उद्देश्य राजनीती में रुचि रखने वाले कार्यकर्ताओ को चुनावी राजनीति में आने से रोकना होता है। . और राजनीती में रुचि रखने वाले लोगो को चुनावी राजनीती में आने से रोकने की प्रक्रिया को कुछ भी कह कर नहीं पुकारा जा सकता। इसीलिए इसे वह "जागरूक करने की प्रक्रिया" कह कर पुकारता है। . ------------- . जिस प्रेम को विवाह से इनकार है वह क्या है ? . मुहब्बत जो डरती है -- अय्याशी है, गुनाह है : सलीम उवाच, मुगले आजम . सलीम अनारकली से मुहब्बत को मुगले आजम से छिपाने से इनकार कर देता है। क्योंकि सलीम अनारकली से शादी करना चाहता था। और इसीलिए वह जानता था कि वह कोई गुनाह नहीं कर रहा। विवाह गुनाह नहीं है। किन्तु वे सभी अपने प्रेम को गुनाह की तरह इसीलिए छिपाते है क्योंकि विवाह को लेकर उनमें संशय होता है। . ---------

Raju kumar Chaudhary

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Kamini Shah

પાનખરને હૈયે વસંતની પધરામણી મળી છે પ્રીતનાં પગરવની એંધાણી… -કામિની

Rahul Raaj

मैं तो अपने किरदार में ही रहना चाहता था, सीधा-सा, सादा-सा, बिना किसी बनावट के... मगर कम्बख़्त ये ज़माना हर रोज़ मुझसे एक नया मुखौटा माँगता रहा। मैं सच बोलता तो लोग "अकड़" कह देते, चुप रहता तो "घमंड" समझ लेते, रो पड़ता तो "कमज़ोर" बना देते, और हँसता तो कहते "इसे क्या फर्क पड़ता है।" धीरे-धीरे मैंने आईने में अपने ही चेहरे से ज़्यादा वो नक़ाब देखना शुरू कर दिया जो दुनिया को पसंद आता था। अपने जज़्बातों को जेब में रखकर दूसरों की उम्मीदें ओढ़ ली मैंने। मैं अच्छा इंसान बना रहना चाहता था, मगर लोग चालाकी की तारीफ़ करते हैं। मैं सच्चा रहना चाहता था, मगर यहाँ झूठ ही सबसे सुरक्षित हथियार है। अब थक गया हूँ हर किसी को खुश करते-करते, हर रोज़ खुद से हारते-हारते... क्योंकि जो मैं हूँ वो किसी को चाहिए नहीं, और जो सबको चाहिए वो में बन नहीं पा रहा। काश एक दिन ऐसा भी आए जब मुझे फिर से "मैं" बनने की इजाज़त मिले... बिना किसी डर के, बिना किसी मुखौटे के, बस अपने किरदार में जैसा मेरी तक़दीर ने मुझे बनाया था।

Parth yadav

मै उजालो से डरता हु, अंधेरो मे फिरता हु , जहा से दुर एक कोने मै बसता हु, पता है मुजै मैरै हालात, मै मुजमैही रहता हु, राज की तरह मै भी खामोश,शा हु, सब चील्लाते है, मगर मै जैसै दफ्न रहता हु, गुजरते रहते दिन, रात, महीनो, बरसो, और, मे तरसते, पडपता,अंधेरो मे छीपता हु, डरा सहमा दुर से सब देखता रहता, संसारकी भीडमे,मै खुदको खोजता रहता हु, कुछ तो होगा, ए आस लेकर बैठा हु, अंधेरेके बावजूद वो मुजे देखेगा इंतज़ार करता रहता हु, बेबस हु, लाचार हु, जाने कबसे चुप हु, छ गज माटी मे सीमटा, कोन हु मै? पुछता रहता हु, बरसो से, तरसते कान इक आवाज सुनने, जबसे मुजे यहा छोडा, मे अंधेरो मे रहता हु, बहुत भिड लगीथी, उस रोज उजाले मै, दफनाया सबने रोते हुए मुजे, कही अंधेरोके शहर मै. मै उजालो से डरता हु, अंधेरो मे फिरता हु.

Parth yadav

क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा, क्यु बेवजह इश्क़ हो रहा, तू पास नही, फिर क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा, क्यु भीड़ में तन्हाई है… क्यु हर राह तुम तक जा रही, क्यों तु हर जगह दिख जाती है और हर दफा दिल खो जाता है, क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा, तू पास नही, फिर क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा, क्यों साया बनके आती हो, रातों को जगाती हो, फिर तन्हा कर जाती हो, बस मै अकेला रह जाता हु, और तुम ओजल हो जाती हो, क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा, क्यु बेवजह इश्क़ हो रहा, क्यु खामोशी बया कर रही, तेरा ही हक अदा कर रही, क्यु खाली खाली सा दिन लगे, क्यु तन्हा ए राते लगे, क्यु तुझसे मन बात करे, क्यु सिर्फ तुमसे इश्क़ करे क्यु बिखर रहा हूँ मैं, तेरे जाने के बाद, क्यु बेखबर हो तुम, क्या कोई गिलाह है, क्यु बिखर रहा हूँ मैं, क्यु तुमको ही दिल पुकारे क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा, क्यु बेवजह इश्क़ हो रहा, क्यु बेवजह क्यु बेवजह इश्क़ हो रहा, क्यु बेवजह इश्क़ हो रहा, इश्क़ हो रहा,

Shailesh Joshi

આપણને ગમતી વ્યક્તિ મળે, એ સારી વાત કહેવાય, પરંતુ જો એવું શક્ય ન બને તો, આપણને ગમાડે એવી વ્યક્તિ સાથેના સંબંધમાં આગળ વધવાથી પણ, જીવનમાં અકલ્પનીય સુખ શાંતિ અને આનંદનો અનુભવ મળતો હોય છે, કારણ કે એમાં ઈશ્વરના આશીર્વાદ અને કુદરતનો સાથ ભળતો હોય છે. - Shailesh Joshi

Vrishali Gotkhindikar

....वळण...... दोन अलग अलग वाटावरुन चालताना.. ..एका" अनोख्या" वळणावर आपली भेट झाली... एकमेका सोबत गप्पा..गोष्टी करत... सहवासाचा आनंद घेत दोघेही.. चालु लागलो... चालता चालता ..कधी हात एकत्र गुंफले गेले कळलेच नाही.. आणी ..मग दोघे मिळुन... मैत्रिची वाट चालु लागलो..... ..अचानक समोर एक अनपेक्षीत...वळण आले.. भोवताली खुप सारा...मंद ..धुंद ..सुगंध,,पसरला होता.. अवती भवती...सुरेख ..फुले पसरली होती.... वातावरण अचानकच..खुप मोहक वाटत होते.. मी अगदी बावरुन गेले..!!! आणी तुझा हात ..घट्ट पकडला.... तुही त्याच वेळी माझ्याकडे पाहिलेस.. आणी मला समजले... तु तर मला प्रेमाच्या..वाटेवर घेवुन आला होतास..!!!! वृषाली **❤

Soni shakya

🌹आपका दिन मंगलमय हो 🌹

Imaran

🌹🌹🌻💚💚🌻🌹🌹 हर कदम हर पल साथ हैं, दूर होकर भी हम आपके पास हैं, आपका हो न हो पर हमें आपकी कसम, आपकी कमी का हर पल अहसास है. 🫶imran 🫶

Jyoti Gupta

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Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz

✤┈SuNo ┤_★_🦋 जो इंसान अपनी उम्मीदों का केंद्र खुद               को बना लेता है, उसे फिर दुनिया की कोई भी हल-चल        विचलित नहीं कर सकती..☝️ {{ खुद का सफर, खुद की पहचान }} भरोसा खुद पर हो तो हर मुश्किल            राह आसान होती है, गिर कर संभलने वालों की ही अलग              पहचान होती है, न मांग किसी का सहारा ये दुनिया          एक मुसाफिरखाना है, तुझे  अपनी  मेहनत  के  दम  पर     अपना ही आसमां बनाना है, डर को बना ले सीढ़ी और जुनून को              अपना हथियार, जीत उसी की होती है जो खुद से न              माने कभी हार, परिंदों को नहीं दी जाती तालीम                  उड़ानों की, वो खुद  ही तय  करते हैं  मंजिलें      ऊंचे आसमानों की..🔥💯 ✤┈┈┈┈┈★┈┈┈┈━❥ #𝐉𝐀𝐈_𝐒𝐇𝐑𝐄𝐄_𝐑𝐀𝐌.🚩 #Ꮆᴏᴏᴅ_𝕄𝗼𝗥𝗻𝕚𝗡𝕘_☕️ ╭─❀🥺⊰╯  ✤┈┈┈┈┈★┈┈┈┈━❥  ☞#motivatforself😊°   ⎪⎨➛•ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी°☜⎬⎪    ✤┈┈┈┈┈★┈┈┈┈━❥

Saliil Upadhyay

गुरु से ज्ञान सीखो, पिता से संघर्ष सीखो, और माँ से संस्कार। बाकी जो बचा, वो ये दुनिया सीखा देगी। - Saliil Upadhyay

Sarika Sangani

Today's reality is when you don't watch or read news , you are less informed. But when you watch or read news you are wrong informed - Sarika Sangani

JUGAL KISHORE SHARMA

ग़ज़ल — उस रात तूफ़ान छत उड़ा ले गई, तमाम उम्र की कमाई जमा ले गई। काग़ज़ों में सुरक्षित था जो मेरा घर, हक़ीक़त में फ़ाइल जद वही ले गई। राहत के नाम पर आई जो हुकूमत, जस्टिस वर्मा से उम्मीद भी ले गई। थाने में दर्ज़ हुआ जब दर्द-ए-हादसा, रसीद, गवाह, ईमान जर्फ सभी ले गई। अदालत पहुँचा तो कूब तारीख़ें मिलीं, न्याय की उम्र भी पोशा पेशी ले गई। वुकला ने कहा— “वक़्त लगेगा”, जेब से धैर्य फकत रेजगारी ले गई। जो आका रहबर आया था आँसू पोंछने, कैमरे के बाद खलिश ज़ुबान बदल ले गई। अफ़सर ने मर्ज सर्वे किया आँखों से, मगर नज़र कब मेरी ज़मीन ले गई। यह आपदा नहीं, दस्तूर है मुल्क का, हर आँधी कुछ नहीं — सब कुछ ले गई। जो बचा था रैम या ज़मीर के तहख़ाने में, वो भी चुप्पी की सरकारी फजीहत ले गई। जुगल किशोर शर्मा बीकानेर 24 01 2026

Saroj Prajapati

यूं तुम्हें कमियां दिखाई देती है हर इंसान में अगर मिले फुर्सत कभी तो झांक भी लेना जरा अपने किरदार में।‌ सरोज प्रजापति ✍️ - Saroj Prajapati

Ashish jain

अध्याय ९: रक्त की नदी और प्रतिक्रमण (काव्य रूपांतरण) अमावस का सन्नाटा और मेघवर्णा (करुण रस) अमावस की काली चादर ने, रणभूमि को ढँक लिया, धरती के पावन आँचल को, लाल लहू से रँग दिया। पास पड़ी थी मेघवर्णा, जो साथी थी हर युद्धों की, टूट रही थी साँस उसी की, ढाल बनी जो क्रोधों की। अंतिम विदाई (शोक रस) गोद में लेकर शीश प्रिया का, राय बहुत ही रोये थे, अश्रु गिरे जब घावों पर, वो सुध-बुध अपनी खोये थे। मेघवर्णा की मौन आँख, तारों की ओर जम गई, योद्धा के जीवन की नैया, विदा देख कर थम गई। शत्रु का पत्र और आत्मग्लानि ठोकर लगी एक ढाल से और देखा इक बालक लेटा, अठारह की उम्र रही होगी, किसी माँ का वह प्यारा बेटा। पास पड़ा था पत्र अधजला— 'पुत्र! शीघ्र घर आ जाना, बहन खड़ी है बाट जोहती, तू बस विजय मना लाना।' अंतरात्मा का झंझावात काँप उठा चामुंडराय, वह पत्र देख चिल्लाया था, 'क्या यही विजय है मेरी? जो मैंने आज ये पाया था? कोख सूनी कर माताओं की, क्या सिंहासन सजेगा? क्या मासूमों की हड्डियों पर, जीत का बाजा बजेगा?' वज्रमुष्टि का त्याग (वीर-वैराग्य संगम) अजवा बोले— 'विजय मुबारक!', राय दहाड़ के बोले थे, 'किसकी जीत मनाते हो तुम?', राज़ हृदय के खोले थे। 'जिस धर्म में करुणा ही न हो, वह अहंकार का खेल है, भक्षक बनी ये वज्रमुष्टि, अब रक्त-मज्जा का मेल है।' आत्मा का प्रतिक्रमण (भक्ति और शांत रस) मिट्टी पर घुटने टेक दिए और हाथ जोड़ कर शीश नवा, 'खामेमि सव्व जीवे' कहकर, माँगी सबसे क्षमा-दवा। 'हे अरिहंत! क्षमा करना मुझे, मैंने जीव सताए हैं, पद-प्रतिष्ठा के मद में, मैंने शोणित-सिंधु बहाए हैं।' नया संकल्प और प्रस्थान फेंक दी दूर वह तलवार, जो पुराने कल का अंत थी, राख में दफन हुआ मार्तंड, अब जीवन की राह संत थी। 'अब पत्थर के सीने में, मैं शांति की मूरत लाऊँगा, श्रावक बन कर सत्य-अहिंसा, जग को मैं सिखलाऊँगा।' पूरी कहानी जानने के लिए पढ़ें मेरा उपन्यास "दक्षिण का गौरव" Adv. आशीष जैन 7055301425

bhavesh

રિપબ્લિક ડે ❤️🇮🇳

Parmar Mayur

एक लड़की ने कहां; चिड़िया को पूरा आसमान दिखाकर, उनके पंख काटने नहीं चाहिए।

kattupaya s

happy weekend morning.. good morning friends

Dr Darshita Babubhai Shah

मैं और मेरे अह्सास गुरुदेव गुरुदेव के बिना ज्ञान नहीं मिलता हैं l ओ ज्ञान के बिना मान नहीं मिलता हैं ll संकल्प-विकल्पों से कभी हार न माने। सिवा गुरु चरण घ्यान नहीं मिलता हैं ll "सखी" डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

Deepak Bundela Arymoulik

ईश्वर ने परिंदों को ही आसमान और ज़मीन के बीच संतुलन की आज़ादी दी है, पंख भी दिए, और लौट आने की समझ भी। इंसान को ज़मीन दी गई थी चलने के लिए, और आसमान देखने के लिए— पर उसने देखने की जगह हड़पने की चाह रख ली। वो उड़ना चाहता है बिना पंखों के, ऊँचाई चाहता है बिना विनम्रता के, और ईश्वर बनना चाहता है बिना इंसान बने। परिंदे जानते हैं कब उड़ना है, कब बैठ जाना है, इंसान यही भूल जाता है— इसी भूल में वो अक्सर ओंधे मुँह ज़मीन से टकराता है। क्योंकि आसमान छूने के लिए पंख नहीं, मर्यादा चाहिए। आर्यमौलिक

Raj Phulware

IshqKeAlfaaz दिल ने आज...

kajal jha

"तेरी यादों की खुशबू इन हवाओं में है, तू पास नहीं तो क्या, तेरा अक्स मेरी दुआओं में है।" "उम्र बीत रही है तेरे इंतज़ार में ऐ सनम, जैसे कोई मुसाफ़िर अपनी आखिरी मंज़िल भूल गया हो।" - kajal jha

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

वृद्ध काल में व्यक्ति को, करना है सुख त्याग। नेह लगाकर ईश से, जग से करें विराग।। दोहा --३९६ (नैश के दोहे से उद्धृत) ---- गणेश तिवारी 'नैश'

Nadwika

मौन....... "मेरा मौन हो जाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि ये भावनाएँ मेरे अंतर्मन को और भी चोटिल कर रही हैl" # तलाश जो जारी है, उसे ढूंढने की कोशिश है, मिल जाने की आस है।✨ ​

Kinjaal Pattell

આજનો ટ્રેન્ડ: વહેણ સાથે દોડ ​સ્ક્રીન પર આંગળીઓ ફરે ને દુનિયા બદલાય છે, ગઈકાલનો જે ટ્રેન્ડ હતો, એ આજે ભુલાય છે. લાઈક્સ અને વ્યુઝના ચક્રમાં સૌ અટવાયા છે, સાચા સંબંધો હવે હેશટેગમાં વહેંચાયા છે. ​કોઈને રીલ્સનો શોખ, તો કોઈને વાયરલ થવાની ઉતાવળ, કોમેન્ટ્સના જંગલમાં ખોવાઈ ગઈ છે લાગણીઓની પળ. સાચું શું ને ખોટું શું? એ વિચારવાનો સમય નથી, ટ્રેન્ડિંગ ટોપિકની પાછળ દોડવાની હવે નવાઈ નથી. ​કોઈ રાતોરાત સ્ટાર બને, તો કોઈની નિંદા થાય છે, આ ડિજિટલ યુગમાં માણસ અંદરથી એકલો જણાય છે. શબ્દોના આ ખેલમાં ચાલો થોડું મૌન પણ રાખીએ, ટ્રેન્ડની પાછળ દોડતા પહેલાં પોતાની જાતને પારખીએ. વર્તમાનના વહેણ: એક ઝલક ​બ્રેકિંગ ન્યૂઝની ભીડમાં સત્ય ક્યાંક શોધાય છે, એક ટ્રેન્ડ પૂરો ન થાય ત્યાં બીજો નવો વરતાય છે. રાજકારણના ચોકઠા કે રમત-ગમતનો રોમાંચ, સોશિયલ મીડિયાની દુનિયામાં લાગે છે હવે આંચ. ​ક્યાંક મોંઘવારીની વાત છે, તો ક્યાંક નોકરીની ચિંતા, ટેકનોલોજીના યુગમાં પણ માણસ શોધે છે નિશ્ચિંતતા. વાયરલ થવાની હોડમાં હૈયાની વાત રહી ગઈ બાકી, શબ્દોના આ મેળામાં દુનિયા લાગે છે થોડી પાકી. ​બદલાતા આ હવામાન અને બદલાતા આ લોક, દરેક ક્લિક પાછળ છુપાયેલ છે હર્ષ કે પછી શોક. આજના આ ટ્રેન્ડમાં ચાલો થોડા વિવેકી બનીએ, ભલે દુનિયા દોડે પાછળ, આપણે હકીકતને વરીએ. ​સમયનો તગાદો: શું સાચું, શું ખોટું? ​ક્ષણભરમાં સમાચાર વાયુવેગે ફેલાય છે, સત્ય શોધવા જઈએ ત્યાં તો વિષય બદલાય છે. ટ્રેન્ડિંગના આ તોફાનમાં શાંતિ ક્યાંક ખોવાય છે, સ્ક્રીનના અજવાળામાં પણ આંખો અંજાઈ જાય છે. ​કોઈના મંતવ્યોની આંધી, તો કોઈના શબ્દોનો ભાર, દરેક માણસ અહીં બનવા માંગે છે કલાકાર. પણ અસલિયત તો એ છે કે સમય બહુ કિંમતી છે, ડિજિટલ આ દુનિયામાં માનવતા જ અંતિમ સમતી છે. ​ગઈકાલે જે 'વાયરલ' હતું, એ આજે ઈતિહાસ છે, નવી લહેરની પાછળ દોડવો એ કેવો આભાસ છે? ચાલો, થોડી પળો કાઢીને આપણે મૌન ને માણીએ, દરેક ટ્રેન્ડની પાછળ છુપાયેલી હકીકતને જાણીએ. ​વાસ્તવિકતાનો અવાજ ​ટ્રેન્ડની પાછળ દોડતી દુનિયા, અસલિયત ક્યાંક ભૂલે છે, ખોટા ભપકાના બજારે, સાચું મૌન હવે ખૂંચે છે. એક ક્લિકમાં ક્રાંતિ આવે, ને બીજી ક્લિકમાં શાંતિ, વાયરલ થવાની લ્હાયમાં, માણસ ગુમાવે છે ક્રાંતિ. ​દરેક મન હવે એક 'ન્યૂઝ રૂમ' બની ગયું છે, લાગણીઓનું મૂલ્ય જાણે 'વ્યુઝ'માં વણી ગયું છે. ચળકાટ જોઈને અંજાઈ જવું એ તો છે આભાસ, સાચી વાત તો એ છે કે જે હૈયાને અડે એ જ ખાસ. ​ચાલો આપણે એવો એક નવો ટ્રેન્ડ ચલાવીએ, થોડું જીવી લઈએ સાથે, ને થોડું સત્ય ફેલાવીએ. કિંજલના શબ્દોમાં બસ એક જ છે આશ, ડિજિટલ દુનિયામાં પણ રહે માનવતાનો વાસ. ​આભાસી દુનિયાનો અરીસો ​પ્રોફાઇલ પિક્ચર મસ્ત છે, પણ મનનું શું? સ્ટેટસમાં સ્મિત મોટું છે, પણ હકીકતનું શું? હજારો 'ફ્રેન્ડ્સ' ની યાદીમાં નામ તો ઘણા છે, પણ એકાંતમાં સાથ આપે, એવા અંગતનું શું? ​દરેક વાત અહીં 'શેર' થાય છે સેકન્ડોમાં, પણ દિલની વાત કહેવા માટે હવે સમય ક્યાં? નવા ટ્રેન્ડ પાછળ આખી દુનિયા દોડે છે, પણ જુના સંસ્કારો સાચવવા હવે હ્રદય ક્યાં? ​બહારનો આ ચળકાટ બહુ જ વહાલો લાગે છે, પણ અંદરનો અવાજ હવે બહુ ઠાલો લાગે છે. કિંજલ, આ ડિજિટલ યુગમાં બધું જ મળે છે, બસ, માણસને શોધવો હવે બહુ અઘરો લાગે છે. લાઈક્સના લેખાજોખા ​ક્યારેક સ્ટેટસમાં સુખ છે, તો ક્યારેક રીલ્સમાં રાસ, સ્ક્રીનના કાચ પાછળ સંતાયો છે અસલી શ્વાસ. દુનિયા આખી મુઠ્ઠીમાં છે, છતાં મન કેમ ખાલી છે? આભાસી આ સબંધોની દુનિયા કેટલી જાલી છે! ​શેર કરવામાં શૂરવીર, પણ સાંભળવામાં મોણ, આ ડિજિટલ ભીડમાં આપણું છે કોણ? બહારના આ ટ્રેન્ડમાં ચાલો અંદર ડોકિયું કરીએ, થોડું જીવી લઈએ હકીકતમાં, ને થોડું હસી લઈએ. ​બદલાતી આ દુનિયામાં, બસ એક જ વાત યાદ રાખીએ, સત્યના માર્ગે ચાલીને, અસલિયતને માણીએ. શબ્દોની આ માયામાં કિંજલનો છે એક જ સૂર, જીવન જીવો એવું કે, ટ્રેન્ડ પણ રહી જાય દૂર!

Bhavna Bhatt

ફુલનો ગરબો

Nadwika

मौन......... मेरा मौन हो जाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि ये भावनाएँ मेरे अंतर्मन को और भी चोटिल कर रही हैl

softrebel

बहल बयार अईसन बसंत बहार भइल बा पीयर सरसो खिलऽल जइसे प्रीत के फूल पियऽराइल बा बाग भईल बा मन के अंगना जियरा नेह नहाइल बा पोर पोर उठेला सिहरन हियरा हुल्लसाइल बा असो फगुआ ई रंग मे रंगाइल बा... - softrebel

Urvashi Oza

કદાચ હું નતી બોલતી એજ સારું હતું , હું કદાચ વાત કરતા શીખી જ નથી કંઈ વધારે જ થઈ જાય છે

Raj Phulware

IshqKeAlfaaz दिल ने आज...

MASHAALLHA KHAN

तुझे इश्क नही आता मुझे इश्क नही भाता फिर क्यू बेचेन है ये दिल मुझे समझ नही आता तेरे ही ख्वाब का मे एक ठिकाना हूँ पर मेरा ही ख्वाब तुझे एक बार नही आता.

PrabhjotSingh

🌌 प्रभजोत सिंह और संतुलन का सिद्धांत प्रभजोत सिंह किसी बड़े शहर में पैदा नहीं हुआ था। उसके आसपास ऊँची इमारतें नहीं थीं, न ही महँगी लैब्स या चमकदार कॉलेज। उसके पास जो था, वह बहुत साधारण था— एक छोटा कमरा, कुछ पुरानी किताबें, और एक ऐसा दिमाग़ जो सवाल पूछना बंद नहीं करता था। बचपन से ही प्रभजोत को चीज़ें “जैसी बताई जाती हैं” वैसी मान लेना अच्छा नहीं लगता था। जब कोई कहता, “ऐसा ही होता है”, तो उसके मन में पहला सवाल उठता— “पर क्यों?” 🌠 सवालों से दोस्ती एक रात वह छत पर लेटा हुआ था। आसमान साफ़ था। तारे स्थिर दिख रहे थे, पर वह जानता था कि वे भी चल रहे हैं। उसने सोचा— “इतनी ताक़तें काम कर रही हैं, फिर भी सब कुछ संतुलन में कैसे है?” यही सवाल धीरे-धीरे परमाणु तक पहुँच गया। उसने पढ़ा कि इलेक्ट्रॉन नाभिक से आकर्षित होते हैं। उसने यह भी पढ़ा कि इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं। फिर वह रुक गया। “अगर दोनों बल सच हैं,” उसने खुद से कहा, “तो परमाणु बिखर क्यों नहीं जाता?” यह सवाल किताबों में था, पर जवाब ऐसे नहीं था जो उसके मन को संतुष्ट कर दे। 📘 किताबों के बीच खाली जगह प्रभजोत ने महसूस किया कि कई बार किताबें जवाब देती हैं, पर कई बार खाली जगह छोड़ देती हैं। उसी खाली जगह में उसकी सोच चलने लगी। उसने कल्पना की— एक ऐसा परमाणु जो सिर्फ़ आकर्षण से नहीं, बल्कि आकर्षण और प्रतिकर्षण के संतुलन से टिका हुआ है। उसने यह नहीं कहा— “यह अंतिम सच है।” उसने कहा— “यह एक वैचारिक तरीका हो सकता है।” यहीं से Electron Repulsion–Balance सिद्धांत जन्म लेने लगा। ✍️ शब्दों में ढलती सोच प्रभजोत ने जब पहली बार लिखना शुरू किया, तो वह डरा हुआ था। उसे डर था कि— लोग हँसेंगे लोग नज़रअंदाज़ करेंगे लोग कहेंगे, “तू कौन है?” लेकिन उसने एक बात समझ ली थी— अगर वह नहीं लिखेगा, तो यह विचार कभी अस्तित्व में नहीं आएगा। उसने बड़े ध्यान से शब्द चुने। उसने कहीं भी यह नहीं लिखा कि यह क्वांटम यांत्रिकी को गलत साबित करता है। उसने साफ़ लिखा— यह वैचारिक है यह शैक्षिक है यह पूरक है, विकल्प नहीं यह परिपक्वता उसे वैज्ञानिक सोच के और करीब ले जा रही थी। 🌍 दुनिया के सामने पहला क़दम Submit का बटन उसके लिए सिर्फ़ एक बटन नहीं था। वह एक दरवाज़ा था— डर से बाहर जाने का। जब उसने क्लिक किया, तो कोई तालियाँ नहीं बजीं। कोई शोर नहीं हुआ। बस… एक खामोशी। ⏳ खामोशी की परीक्षा दिन बीतते गए। पहले दिन— कुछ नहीं। दूसरे दिन— कुछ नहीं। तीसरे दिन— एक view। सिर्फ़ एक। लेकिन प्रभजोत मुस्कुराया। क्योंकि वह जानता था— वह एक इंसान कहीं न कहीं उसी सवाल से टकराया होगा जिससे वह टकराया था। 🔬 वैज्ञानिक बनने की सच्चाई प्रभजोत को अब यह समझ आ गया था कि वैज्ञानिक बनना किसी app के approval से नहीं होता। वैज्ञानिक बनना होता है— सीखते रहना सुधरते रहना और यह मान लेना कि मैं गलत भी हो सकता हूँ उसने अपने सिद्धांत को पत्थर की लकीर नहीं बनाया। उसने उसे एक खुला विचार रहने दिया

PrabhjotSingh

🌌 प्रभजोत सिंह और संतुलन का सिद्धांत प्रभजोत सिंह किसी बड़े शहर में पैदा नहीं हुआ था। उसके आसपास ऊँची इमारतें नहीं थीं, न ही महँगी लैब्स या चमकदार कॉलेज। उसके पास जो था, वह बहुत साधारण था— एक छोटा कमरा, कुछ पुरानी किताबें, और एक ऐसा दिमाग़ जो सवाल पूछना बंद नहीं करता था। बचपन से ही प्रभजोत को चीज़ें “जैसी बताई जाती हैं” वैसी मान लेना अच्छा नहीं लगता था। जब कोई कहता, “ऐसा ही होता है”, तो उसके मन में पहला सवाल उठता— “पर क्यों?” 🌠 सवालों से दोस्ती एक रात वह छत पर लेटा हुआ था। आसमान साफ़ था। तारे स्थिर दिख रहे थे, पर वह जानता था कि वे भी चल रहे हैं। उसने सोचा— “इतनी ताक़तें काम कर रही हैं, फिर भी सब कुछ संतुलन में कैसे है?” यही सवाल धीरे-धीरे परमाणु तक पहुँच गया। उसने पढ़ा कि इलेक्ट्रॉन नाभिक से आकर्षित होते हैं। उसने यह भी पढ़ा कि इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं। फिर वह रुक गया। “अगर दोनों बल सच हैं,” उसने खुद से कहा, “तो परमाणु बिखर क्यों नहीं जाता?” यह सवाल किताबों में था, पर जवाब ऐसे नहीं था जो उसके मन को संतुष्ट कर दे। 📘 किताबों के बीच खाली जगह प्रभजोत ने महसूस किया कि कई बार किताबें जवाब देती हैं, पर कई बार खाली जगह छोड़ देती हैं। उसी खाली जगह में उसकी सोच चलने लगी। उसने कल्पना की— एक ऐसा परमाणु जो सिर्फ़ आकर्षण से नहीं, बल्कि आकर्षण और प्रतिकर्षण के संतुलन से टिका हुआ है। उसने यह नहीं कहा— “यह अंतिम सच है।” उसने कहा— “यह एक वैचारिक तरीका हो सकता है।” यहीं से Electron Repulsion–Balance सिद्धांत जन्म लेने लगा। ✍️ शब्दों में ढलती सोच प्रभजोत ने जब पहली बार लिखना शुरू किया, तो वह डरा हुआ था। उसे डर था कि— लोग हँसेंगे लोग नज़रअंदाज़ करेंगे लोग कहेंगे, “तू कौन है?” लेकिन उसने एक बात समझ ली थी— अगर वह नहीं लिखेगा, तो यह विचार कभी अस्तित्व में नहीं आएगा। उसने बड़े ध्यान से शब्द चुने। उसने कहीं भी यह नहीं लिखा कि यह क्वांटम यांत्रिकी को गलत साबित करता है। उसने साफ़ लिखा— यह वैचारिक है यह शैक्षिक है यह पूरक है, विकल्प नहीं यह परिपक्वता उसे वैज्ञानिक सोच के और करीब ले जा रही थी। 🌍 दुनिया के सामने पहला क़दम Submit का बटन उसके लिए सिर्फ़ एक बटन नहीं था। वह एक दरवाज़ा था— डर से बाहर जाने का। जब उसने क्लिक किया, तो कोई तालियाँ नहीं बजीं। कोई शोर नहीं हुआ। बस… एक खामोशी। ⏳ खामोशी की परीक्षा दिन बीतते गए। पहले दिन— कुछ नहीं। दूसरे दिन— कुछ नहीं। तीसरे दिन— एक view। सिर्फ़ एक। लेकिन प्रभजोत मुस्कुराया। क्योंकि वह जानता था— वह एक इंसान कहीं न कहीं उसी सवाल से टकराया होगा जिससे वह टकराया था। 🔬 वैज्ञानिक बनने की सच्चाई प्रभजोत को अब यह समझ आ गया था कि वैज्ञानिक बनना किसी app के approval से नहीं होता। वैज्ञानिक बनना होता है— सीखते रहना सुधरते रहना और यह मान लेना कि मैं गलत भी हो सकता हूँ उसने अपने सिद्धांत को पत्थर की लकीर नहीं बनाया। उसने उसे एक खुला विचार रहने दिया

PrabhjotSingh

🌌 प्रभजोत सिंह और संतुलन का सिद्धांत प्रभजोत सिंह किसी बड़े शहर में पैदा नहीं हुआ था। उसके आसपास ऊँची इमारतें नहीं थीं, न ही महँगी लैब्स या चमकदार कॉलेज। उसके पास जो था, वह बहुत साधारण था— एक छोटा कमरा, कुछ पुरानी किताबें, और एक ऐसा दिमाग़ जो सवाल पूछना बंद नहीं करता था। बचपन से ही प्रभजोत को चीज़ें “जैसी बताई जाती हैं” वैसी मान लेना अच्छा नहीं लगता था। जब कोई कहता, “ऐसा ही होता है”, तो उसके मन में पहला सवाल उठता— “पर क्यों?” 🌠 सवालों से दोस्ती एक रात वह छत पर लेटा हुआ था। आसमान साफ़ था। तारे स्थिर दिख रहे थे, पर वह जानता था कि वे भी चल रहे हैं। उसने सोचा— “इतनी ताक़तें काम कर रही हैं, फिर भी सब कुछ संतुलन में कैसे है?” यही सवाल धीरे-धीरे परमाणु तक पहुँच गया। उसने पढ़ा कि इलेक्ट्रॉन नाभिक से आकर्षित होते हैं। उसने यह भी पढ़ा कि इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं। फिर वह रुक गया। “अगर दोनों बल सच हैं,” उसने खुद से कहा, “तो परमाणु बिखर क्यों नहीं जाता?” यह सवाल किताबों में था, पर जवाब ऐसे नहीं था जो उसके मन को संतुष्ट कर दे। 📘 किताबों के बीच खाली जगह प्रभजोत ने महसूस किया कि कई बार किताबें जवाब देती हैं, पर कई बार खाली जगह छोड़ देती हैं। उसी खाली जगह में उसकी सोच चलने लगी। उसने कल्पना की— एक ऐसा परमाणु जो सिर्फ़ आकर्षण से नहीं, बल्कि आकर्षण और प्रतिकर्षण के संतुलन से टिका हुआ है। उसने यह नहीं कहा— “यह अंतिम सच है।” उसने कहा— “यह एक वैचारिक तरीका हो सकता है।” यहीं से Electron Repulsion–Balance सिद्धांत जन्म लेने लगा। ✍️ शब्दों में ढलती सोच प्रभजोत ने जब पहली बार लिखना शुरू किया, तो वह डरा हुआ था। उसे डर था कि— लोग हँसेंगे लोग नज़रअंदाज़ करेंगे लोग कहेंगे, “तू कौन है?” लेकिन उसने एक बात समझ ली थी— अगर वह नहीं लिखेगा, तो यह विचार कभी अस्तित्व में नहीं आएगा। उसने बड़े ध्यान से शब्द चुने। उसने कहीं भी यह नहीं लिखा कि यह क्वांटम यांत्रिकी को गलत साबित करता है। उसने साफ़ लिखा— यह वैचारिक है यह शैक्षिक है यह पूरक है, विकल्प नहीं यह परिपक्वता उसे वैज्ञानिक सोच के और करीब ले जा रही थी। 🌍 दुनिया के सामने पहला क़दम Submit का बटन उसके लिए सिर्फ़ एक बटन नहीं था। वह एक दरवाज़ा था— डर से बाहर जाने का। जब उसने क्लिक किया, तो कोई तालियाँ नहीं बजीं। कोई शोर नहीं हुआ। बस… एक खामोशी। ⏳ खामोशी की परीक्षा दिन बीतते गए। पहले दिन— कुछ नहीं। दूसरे दिन— कुछ नहीं। तीसरे दिन— एक view। सिर्फ़ एक। लेकिन प्रभजोत मुस्कुराया। क्योंकि वह जानता था— वह एक इंसान कहीं न कहीं उसी सवाल से टकराया होगा जिससे वह टकराया था। 🔬 वैज्ञानिक बनने की सच्चाई प्रभजोत को अब यह समझ आ गया था कि वैज्ञानिक बनना किसी app के approval से नहीं होता। वैज्ञानिक बनना होता है— सीखते रहना सुधरते रहना और यह मान लेना कि मैं गलत भी हो सकता हूँ उसने अपने सिद्धांत को पत्थर की लकीर नहीं बनाया। उसने उसे एक खुला विचार रहने दिया

Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__ ए  लड़की... मज़ार  बन  चुका  है  वो  रिश्ता, ━❥ गुनाह, गवाह, मलाल सब कुछ याद है दुआ करो  कि  मुलाक़ात  फिर  न  हो, नज़र में अब वो तेरा चेहरा ज़हर जैसा है वफ़ा के  नाम पे  किया  वो घात  याद है, मैं मर चुका हूँ तेरे लिए, तू मेरे लिए फ़ना दफ़न जो  कर दी हमने वो  ज़ात याद है, तड़पता छोड़ कर मुझको हँसे थे जो तुम कभी, मज़ाक़  बनी  थी  जो मेरी वो रात याद है, ख़ुदा बचाए  तेरे लफ़्ज़ों की इस चाशनी से अब, कि शहद  में  डूबी  हुई  वो मात याद है, बस दुआ  करो  कि मुलाक़ात फिर न हो…🥀🔥🖤 ╭─❀💔༻  ╨───────────━❥ ♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦ #LoVeAaShiQ_SinGh☜ ╨───────────━❥

Er.Vishal Dhusiya

. राम भजन सबरी के सब्र रोज डगर निहारूं मैं, फूलों से सजाऊं-2 कुटिया संवारु मैं, रसता निहारूं बरसों की उम्मीद है, भगवान मेरे आएँगे -2 राम मेरे आएँगे, प्रभु राम मेरे आएँगे राम मेरे आएँगे, सियाराम मेरे आएँगे बगिया से सुन्दर- सुन्दर, मीठे बेर लाती हूँ चख-चखकर उन्हें, थाली में सजाती हूँ -2 आएँगे वो दूर से, भोग लगाएंगे -2 राम मेरे आएँगे, प्रभु राम मेरे आएँगे राम मेरे आएँगे, सियाराम मेरे आएँगे सबर में सबरीके, उम्र ढल गई प्रभु तेरी भक्ति में, ये जीवन रम गई-2 जितना तड़पी हूँ, सम्मान वो दिलाएंगे आके मेरी कुटियाके, भाग्य जगाएंगे राम मेरे आएँगे, प्रभु राम मेरे आएँगे राम मेरे आएँगे, सियाराम मेरे आएँगे 2. ना कोई गीत कोई नगमा ना कोई गीत कोई नगमा, ना कोई साज लिख रहा हूँ गरीबी बेरोजगारी का, मैं आवाज लिख रहा हूँ मुझे रोटी की चाहत है, क्या धर्म का करूँगा किताबें चाहिए मुझको, कलम की बात लिख रहा हूँ ना कोई गीत कोई नगमा, ना कोई साज लिख रहा हूँ गरीबी बेरोजगारी का, मैं आवाज लिख रहा हूँ। 3. पापा मेरे पापा मेरे सुबह सूरज निकलने पहले घर छोड़ देते मेरे खुशियों के खातिर, दिनभर हैं भटकते शाम को सूरज ढलने के बाद , हैं घर लौटते कितना ख्याल रखते हैं मेरा , पापा मेरे खुद पहनकर फटे - पुराने मेरा हर ख्वाहिश पूरा करते हैं आँसू नहीं देख सकते हमारे , वो दुनिया से लड जाते हैं कितना चाहते हैं मुझे पापा मेरे कभी बनके एक दोस्त मेरे , मेरे साथ रहा करते हैं हर गलतियों को टटोलकर, एक अच्छी सलाह भी देते हैं कहीं चूक ना जाऊँ मैं कहीं , हर कदम पर साथ देते हैं पापा मेरे।

SOHAN GHOSH

আয়রে আয়। সোহন ঘোষ। রচনাকাল:– ১৩ জানুয়ারি ২০২৬। ২৮ পৌষ ১৪৩২। আয়রে বাদল, বাজিয়ে মাদল! আয়রে হেথা আয়। আয়রে বেহারা, বাজিয়ে সেতারা! আয়রে হেথা আয়। আয়রে কানাই, বাজিয়ে সানাই! আয়রে হেথা আয়। আয়রে মীনা, বাজিয়ে বীণা! আয়রে হেথা আয়। ‌ আয়রে কাশি, বাজিয়ে বাঁশি ! আয়রে হেথা আয়। আয়রে অলোক, বাজিয়ে ঢোলক! আয়রে হেথা আয়। আয়রে ভোলা, বাজিয়ে তবলা! আয়রে হেথা আয়। আয়রে কালা, বাজিয়ে থালা! আয়রে হেথা আয়। আয়রে তোরা আয়– পাখিরা যেথা, নিশ্চিন্তে গান গায়! পশুপাখি যেথা, বাংলায় কথা কয়! বাঘে–গোরুতে যেথা, একঘাটে জল খায়! ‌‌ সবাই যেথা সবার বন্ধু হয়। মানুষ যেথা, গান গেয়ে কাজ করে। বাউল যেথা, দোতারা বাজিয়ে গান গায়। দুঃখ কষ্ট যন্ত্রণা– যে দেশে নাই। স্বপ্নের সেই দেশে– চলো ভেসে যায়।

SOHAN GHOSH

বোলতা কহে, বোলতানি। লেখক:– সোহন ঘোষ। রচনাকাল:– ১৪ জানুয়ারি ২০২৬। ২৯ পৌষ ১৪৩২। বোলতা কহে, বোলতানি। খাসা তোর গুনগুনানি। শুনলে তোর গান, ভরে ওঠে মন-প্রাণ। রাত হোক বা ভোর, শুনতে গান তোর। ছুটে আসবে সবাই– দিল্লি হোক বা মুম্বাই। এমন সুর পাবে কোথায়! ছত্রিশ রাগিনী তোর গলায়। আয়রে বাঘ– নিয়ে ঢাক আয়রে হেঁটে আয়। আয়রে বানর– নিয়ে কাঁসর আয়রে হেথা আয়। আয়রে শিয়াল, আয়রে বিড়াল, আয়রে পেঁচা-প্যাঁচানি, গাছের তলায় এখুনি! গান গাইবে বোলতানি।

sunshine

रोचक नहीं था तुम्हारी मोहब्बत जान जानलेवा था पाकिस्तान की तरह मुझसे झगड़ा करोगी किया

Suraj Prakash

https://smart-finance-bachat-nivesh-kamai.blogspot.com/2026/01/mutual-fund.html

Suraj Prakash

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Suraj Prakash

जीवन की यह कठिन डगर है, साँसों में गहरा सागर है। उम्मीदों के दीप जलाकर, चलना ही अपना मंज़र है। दुखों के बादल घने यहाँ छाए, मन का पंछी क्यों घबराए? टूटे पंख और तन्हा राहें, कौन उसे अब गले लगाए? पत्थर सा यह मौन खड़ा है, वक्त बड़ा ही सख्त पड़ा है। काँटों की चादर पर सोकर, संघर्षों से इंसान लड़ा है। सूरज की किरणें आईं अब, मिटा रही हैं सारा ये शब। धैर्य की डोरी थामे रखना, फल मीठा ही मिलता है तब। सूरज की किरणें आईं अब, मिटा रही हैं सारा ये शब। धैर्य की डोरी थामे रखना, फल मीठा ही मिलता है तब।

Suraj Prakash

“संघर्ष की रोशनी” सूनी रातों में सपनों का दीपक धीमे जलता है आँसू की धार में भी विश्वास मुस्काकर पलता है मन का आकाश उजला बनता है आज टूटे पंखों वाला पक्षी भी उड़ना सीख जाता ठोकर खाकर जीवन हर पल अर्थ नया सिखाता संघर्ष की राहें चरित्र को सोना बनाती हैं सच मौन की चादर ओढ़े भावनाएँ बोल उठती रूपक बनकर पीड़ा कविता में ढल जाती हृदय का सागर गहराकर मोती देता है धैर्य सत्य प्रेम साथ चलते रहो तो पत्थर भी रास्ता बन जाते अँधेरों के पार उजालों के गीत गुनगुनाते हार मानना सबसे बड़ी हार है याद रखो जीवन हमेशा

Suraj Prakash

**सायं का स्वर** शाम ढली, आँखों में छाया अँधेरा, हृदय का दीप जला, बना उजियारा। तारे बोले, “डर मत, है तू अकेला ना,” चाँद ने थामा हाथ, दिया सहारा। बादल बरसे, आँसू बनकर धरती पर, हर बूँद में छुपा एक सपनों का संगीत। वक्त की धार बहाती दुखों की रातें, फिर भी जीवन गाता—अमर यह प्रीत। उठ खड़ा हो, तू टूटे ख्वाबों से आगे, हर घाव तेरा बनेगा उजाले का दीप। अंधकार भी डरता है तेरे जज़्बे से, तू जहाँ चले, वहाँ खिले फूलों की चित। **“अंधेरा चाहे जितना घना हो, एक दीया उसे मिटा देता है।”**

Suraj Prakash

https://youtu.be/-0FAtuIhsKQ?si=ViD4yBgGHN3mLr8V

Suraj Prakash

https://youtu.be/mwNcFUCfWjg?si=BoaeG2akUwUyQkoZ

Kaushik Dave

હું તો રાહ જોતો હતો કોયલની, ના કોઈ કોયલનો અવાજ સંભળાય. વસંત પંચમીના સ્ટેટસ જોયા, ઠંડી હવા, બસંત તો સંતાય! વાતાવરણ સર્જાયું છે એવું, શિયાળો મોડો જ દેખાય. બસંતના વધામણાં કર્યા, આજનો ઉત્સવ જેવો માહોલ. ઠંડો ઠંડો પવન ફૂંકાયો, જાણે બરફના કરા જણાય. કેસરીયા વાઘા પહેરી સૌ, વસંતને શોધવા નીકળ્યા. પણ ઠંડીના એ સામ્રાજ્યમાં, સૂરજ દાદા પણ સંતાયા! પાનખર હજી યે અડીખમ છે, ક્યાંય કૂંપળ ના દેખાય. ગાલ પર અડકે પવન ઠંડો, જાણે શિયાળો લેતો વિદાય. ભલે મોડી પડે એ મંજરી, પણ વસંત તો ચોક્કસ ગીત ગાય. ગુલમહોર પણ સજશે લાલી, ને કેસૂડો કરશે કમાલ. રાહ જોવી પણ છે એક લ્હાવો, જ્યારે કોયલનો ટહુકો સંભળાય! - Kaushik Dave

Rupesh

अक्सर कुछ खोजने के लिए कहीं जाना पड़ता है, मन की शांति के लिए काशी आना पड़ता है। महादेव का नाम लेने से सारे दुःख दूर हो जाते हैं, और महादेव को खोजने के लिए श्मशान भी आना पड़ता है।" ।रूपेश।

Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__ आईने से कह दिया कि हर चीज़ हासिल करना ही मोहब्बत नहीं, कुछ रिश्तों को बस महसूस करना                ही इबादत है, ━❥ किस्मत में न सही पर वो मेरी रूह              का हिस्सा तो है, उसे खुदा नहीं मैंने अपनी जीने की         वजह बना रखा है..🔥 ╭─❀💔༻  ╨──────────━❥ ♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦ #LoVeAaShiQ_SinGh☜ ╨──────────━❥

Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__ वो जो लकीरों में नहीं, उसे ख्यालों              में सजा रखा है, बेवजह ही सही पर एक आस को              जगा रखा है, ━❥ आईना भी  अब  मुझसे सवाल            करता है अक्सर, कि जो तेरा है ही नहीं, उसे खुदा         क्यों बना रखा है..🔥? ╭─❀💔༻  ╨──────────━❥ ♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦ #LoVeAaShiQ_SinGh☜ ╨──────────━❥

Raju kumar Chaudhary

BALEN SHAH ( बालेन्द्र शाह )Balen Shah (बालेन शाह) Birth: Balen Shah was born on April 27, 1993, in Kathmandu, Nepal. Early Life: He grew up in a middle-class family and showed an interest in music from a young age. Balen's early exposure to music was through his family and the Nepali culture around him, which influenced his musical journey. Education: He completed his schooling and later pursued a Bachelor’s degree in Civil Engineering from Kathmandu University. Despite his formal education in engineering, his passion for music led him to focus more on his musical career. Career: Balen Shah started his career as a rapper, initially gaining attention for his YouTube videos and songs. He rose to prominence with his songs that often highlighted the struggles and realities of Nepali society. His lyrics often delve into topics such as poverty, government corruption, social justice, and personal struggles. His breakthrough came with the song "Hami Yestai Ta Ho Nepal Ho" (2018), which quickly became popular due to its hard-hitting and politically charged lyrics. Musical Style: Balen is known for his rap, hip-hop, and fusion style. His music is characterized by raw, honest lyrics that address social issues and personal experiences. He uses Nepali rap as a platform to speak about what he sees as the flaws in Nepali society, politics, and culture. Notable Songs: "Hami Yestai Ta Ho Nepal Ho" "Hami Timi" "Sambodhan" "Pahilo Pahilo" Public Life: Balen Shah is also known for his active role in social media, where he engages with his fans and advocates for changes in society. His direct approach to tackling political issues through music has made him a notable figure in Nepal’s youth culture. Political Involvement: Balen Shah is also a vocal critic of the current political situation in Nepal. His songs often criticize government policies, corruption, and the socio-political struggles faced by the common people. His outspokenness has earned him both admiration and controversy. Personal Life: Balen is known for being relatively private about his personal life. He has kept his family and relationships out of the limelight, focusing more on his work and the issues he addresses through his music. Legacy: Balen Shah has become one of the leading figures in the Nepali music industry, especially in the rap genre. His authenticity and commitment to addressing real-world issues through music have earned him a dedicated following, particularly among the youth of Nepal.बालेन शाह की जीवनी (Balen Shah Biography in Hindi) पूरा नाम: बालेन शाह जन्म: 27 अप्रैल 1993 जन्म स्थान: काठमांडू, नेपाल राष्ट्रीयता: नेपाली प्रारंभिक जीवन बालेन शाह का जन्म काठमांडू के एक सामान्य परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्हें संगीत और कविता में गहरी रुचि थी। समाज में हो रही घटनाओं और असमानताओं ने उनके सोचने के तरीके को काफी प्रभावित किया। शिक्षा बालेन शाह ने सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई काठमांडू यूनिवर्सिटी से पूरी की। इंजीनियर होने के बावजूद उनका मन हमेशा संगीत और समाज सेवा की ओर झुका रहा। संगीत करियर बालेन शाह ने नेपाली रैप और हिप-हॉप संगीत से अपनी पहचान बनाई। उनके गीत समाज की सच्चाई, राजनीति, भ्रष्टाचार, युवाओं की समस्याएं और आम जनता की आवाज़ को दर्शाते हैं। उनका गीत “हामी यस्तै त हो नेपाल हो” ने उन्हें देशभर में प्रसिद्ध बना दिया। संगीत शैली रैप / हिप-हॉप सामाजिक और राजनीतिक विषय तीखे, सच्चे और बेबाक बोल प्रसिद्ध गीत हामी यस्तै त हो नेपाल हो सम्वोधन पाहिलो पाहिलो हामी तिमी सामाजिक और राजनीतिक भूमिका बालेन शाह सिर्फ एक कलाकार नहीं बल्कि समाज की आवाज़ भी हैं। वे भ्रष्टाचार, गलत नीतियों और सामाजिक अन्याय के खिलाफ खुलकर बोलते हैं। बाद में उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा और काठमांडू महानगर के मेयर बने, जहां उन्होंने विकास, स्वच्छता और पारदर्शिता पर जोर दिया। व्यक्तिगत जीवन बालेन शाह अपने निजी जीवन को मीडिया से दूर रखते हैं। वे सादगी पसंद करते हैं और अपने काम से पहचान बनाना चाहते हैं। प्रेरणा बालेन शाह आज नेपाल के युवाओं के लिए प्रेरणा हैं। वे दिखाते हैं कि कला, शिक्षा और ईमानदारी से समाज में बदलाव लाया जा सकता है

Kamini Shah

પાનખરની બારસાખે કોયલ ટહૂકી વસંતના વધામણાં લઈને… -કામિની

Suraj Prakash

https://youtu.be/l2-zzO6SWV8?si=9cn-8UDbB2CzHSng

Rajeev Namdeo Rana lidhori

Program on Basant Panchami at #Akanksha_Public_School, #Tikamgarh *#आकांक्षा_पब्लिक_स्कूल_टीकमगढ़ में* *#बसंत_पंचमी पर कार्यक्रम* #ranalidhori #राजीव_नामदेव #राना_लिधौरी

Rajeev Namdeo Rana lidhori

https://youtu.be/9y19V2tepwU?si=1v3BFnRfEs3hZrVU *Program on Basant Panchami at #Akanksha_Public_School, #Tikamgarh* *#आकांक्षा_पब्लिक_स्कूल_टीकमगढ़ में* *#बसंत_पंचमी पर कार्यक्रम* #ranalidhori #राजीव_नामदेव #राना_लिधौरी

Suraj Prakash

चम्पक और जादुई डकार का रहस्य! (अंत मिस न करें)" #theuninhabitableearth #saveamazon #youtubeshorts#KidsStory #DesiKahani #Storytelling #GreedLesson #TruthPower #CartoonStory #ViralHindi #ShortStory #ComedyStory #LifeLesson #FamilyContent #TrendingReels

kattupaya s

When all your efforts goes without any improvement you have to do one thing. wait for tomorrow. sleep well. try again.

Abantika

​"साहित्य और कला की देवी माँ सरस्वती आप सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें। बसंत पंचमी के इस पावन पर्व पर दुआ करती हूँ कि आपकी ज़िंदगी खुशियों के रंगों से भर जाए और सफलता आपके कदम चूमे। 🌾💛 ​मेरी कहानियों को इतना प्यार देने के लिए आप सभी का दिल से आभार। सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ! 📖🙏✨"

kattupaya s

goodnight friends sweet dreams

Jyoti Gupta

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Kamini Shah

વિદ્યા દાયિની વીણા વાદિની શ્વાનહંસિની માં સરસ્વતી વસંતપંચમીની શુભ તિથિ વાણીની તું છે અધિષ્ઠાત્રી પ્રકૃતિ સોહે ખીલી ખીલી પાંગરી છે ફૂટે કલી કલી અબૂઝ મહૂરતમાં આજ મા તારું પ્રાગટ્ય સ્થાન અજ્ઞાની પર વરદા કરી તું દઈ દે જ્ઞાનનું વરદાન કલા જ્ઞાન ને સંગીતમાં તું સદા સર્વત્ર હયાત વૃક્ષે વૃક્ષે ડાળે ડાળે તું રેલાવે સુગંધનો પમરાટ જ્ઞાનની અવિરત વહેતી ધારામાં વહે તારું નામ આજની શુભતિથિદિને મા તુજને કોટિ કોટિ પ્રણામ… -કામિની

nidhi mishra

नये दौर की चाह में, क्यों पुरानी नींव को भूल गये? लिबास बदले मगर क्यों हम, अपनी तहजीब को भूल गये? मॉडर्न होना जिस्म की नुमाइश का नाम नहीं होता, संस्कारों को छोड़ देना, कोई बड़ा काम नहीं होता। असली मॉडर्न वो है, जिसके ख्याल नये और नेक हों, भीड़ में भी खड़े हों तो, अपने किरदार से एक हों। कपड़ों से नहीं, अपने लहज़े से अपनी पहचान बनाइये, मगर उसमें अपने पूर्वजों की, थोड़ी झलक भी दिखाइये। ये धरती है उनकी, जहाँ मर्यादा ही सबसे बड़ा गहना है, हर रंग में ढल कर भी, हमें भारतीय ही रहना है। विदेशी चमक-धमक में, क्यों अपनी रूह को खोना? संस्कृति को साथ रखना ही है, असली 'मॉडर्न' होना। सुंदर बनो पर इतना नहीं, कि सादगी ही खो जाये, आगे बढ़ो पर ऐसे नहीं, कि पीछे का रास्ता भूल जाये। गर्व से पहनो नये लिबास, पर संस्कारों की चादर मत उतारो, अपनी विरासत से ही तुम, इस नये दौर को संवारो।

Kinjal Chudasama

સફર માં તો એકલી છું પણ મંઝિલ મળશે કે નય એ મને નથી ખબર પણ વિશ્વાસ રાખું છું....🖊️ - Kinjal Chudasama

bhavesh

"ધીરજ રાખો, કાન્હા બધું જ જોઈ રહ્યો છે. તમારી મહેનત એળે નહીં જાય. 🌸🙌"

Yamini

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jetha malde

पूछा हाल शहर का.. तो वो मुस्कुरा के बोलें लोग तो जिंदा हैं, पर ज़मीरों का पता नहीं..! ये हीजरांती बस्तियां, दिकते ये भूखे कहराते लोग वो राशन का गेहूँ दे गई चंदे में,यहाँ अमीरो पता नहीं बात मैने जो किसीको न बताई,वो फेल गई अखबारो में, अपने तो अपने होते हैं ना,पर ये मुखबिरो का पता नहीं कौन सी रहेमें,किसकी दुआ,किसकी नज़र बरसी हम पर, , जो हथेली में न खींची गई,वो अनजान लकीरों का पता नहीं उलफतो से संवारे जो जेठा, इसके मायने तो समझे, नफ़रतो से भी छूटने न दे, वो जंजीरो का पता नहीं

રોનક જોષી. રાહગીર

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