शायद उसी दिन मैं मर गया
लगता है जैसे मेरा सपना मुकम्मल हो गया,
मरना था जिस दिन... शायद उसी दिन मैं मर गया।
बस छह महीने की कहानी थी, मगर उम्र-सी लगती थी,
हर सुबह तेरी आवाज़ से मेरी दुनिया जगती थी।
हर पल का हिसाब था, हर साँस की ख़बर थी,
तेरी एक मुस्कान में मेरी पूरी सहर थी।
सुबह की पहली दुआ में तेरा ही नाम आता था,
रात का आख़िरी ख़याल भी तुझ तक ही जाता था।
दुनिया चाहे जितनी भी शोर मचाती रहती,
तेरी आवाज़ सुनते ही दिल को सुकून मिलता था।
शेर
हर लम्हा तेरे नाम का उजाला साथ चलता था,
मुझे क्या पता था, अँधेरा भी चुपके पलता था।
तू पूछती थी—"खाना खाया?" मैं हँसकर कह देता था,
झूठ भी बोलता था तो तू सच समझ लेती थी।
मैं पूछता था—"थक तो नहीं गई?"
तू कहती—"तुम हो न... सब ठीक है।"
दिन छोटे लगते थे, रातें भी कम पड़ती थीं,
बातें ख़त्म होतीं नहीं, बस घड़ियाँ थक जाती थीं।
कभी हँसी, कभी शिकवे, कभी बचकानी बातें,
उन लम्हों में ही जैसे छुपी थीं सारी सौगातें।
मुझे आदत नहीं थी किसी की इतनी होने की,
मगर तू आदत बनकर रूह में उतर गई।
तेरे बिना एक घंटा भी भारी लगता था,
और तू मेरी हर धड़कन में बिखर गई।
शेर
इश्क़ शायद यही था, या कोई और नशा था,
तू पास थी तो हर दर्द भी हँसता हुआ लगा था।
फिर एक सफ़र आया... और मौसम बदल गया,
मुस्कुराता हुआ रिश्ता अचानक सँभल गया।
बातें वही थीं, मगर आवाज़ बदल गई,
दिल वहीं था, मगर धड़कन बदल गई।
पहले हर बात पर तू मुस्कुरा देती थी,
अब हर जवाब में ख़ामोशी नज़र आती थी।
मैंने पूछा—"सब ठीक है?"
तू बोली—"हाँ..." मगर वो "हाँ" रोती हुई लगी।
मैं समझ न पाया कि हवा किस ओर चली,
किस मोड़ पर हमारी कहानी बिखर चली।
मैंने हर कमी अपने ही हिस्से लिख डाली,
तेरी हर चुप्पी अपनी सज़ा समझ डाली।
शेर
जो बात लबों तक आई भी, वो कह न सके,
हम अपने ही दर्द का मतलब समझ न सके।
फिर एक दिन वो तस्वीर मेरी आँखों में उतर गई,
कुमुदिनी का वो गुलदस्ता जैसे साँसों में ठहर गया।
फूल तो बस फूल थे, मगर बात और थी,
उस मुस्कान के पीछे कोई नई डोर थी।
हाथ काँपे, नज़र धुँधली हुई,
जैसे रूह ही मुझसे रूठ गई।
मैंने पहली बार ख़ुद को इतना अकेला देखा,
आईने में भी अपना चेहरा पराया देखा।
उस दिन सीने में अजीब-सा दर्द उठने लगा,
हर साँस जैसे कंधों पर बोझ बनने लगा।
कभी बदन पसीने में भीग जाता था,
कभी बुखार बिना वजह चढ़ जाता था।
दवाइयाँ भी थीं, दुआएँ भी थीं,
मगर राहत कहीं दिखाई न दी।
जिस दर्द का नाम मोहब्बत था,
उसकी कोई दवा बनाई न गई।
शेर
जिस ज़ख़्म को दुनिया ने दिल का दर्द कहा,
मैंने उसी को अपनी ज़िंदगी का नाम कहा।
जो पास थे, मेरी ख़ामोशी से घबरा के बिछड़ते गए,
हम तो बिस्तर पे क्या लेटे, लोग समझे कि मरते गए।
होंठ चुप थे, मगर आँखें हर बात कहती थीं,
रातें मेरे तकिए पर चुपके रोती रहती थीं।
दिल यूँ थमा कि धड़कनों ने भी सफ़र छोड़ दिया,
एक ख़बर ने जैसे जीने का हुनर छोड़ दिया।
मैं चलता था मगर मंज़िल कहीं दिखती नहीं थी,
भीड़ में भी अपनी कोई शक्ल मिलती नहीं थी।
फिर तेरे लफ़्ज़ आए—
"अब इतने पैग़ाम न होंगे..."
बस इतनी-सी बात थी,
मगर मेरी पूरी दुनिया उजड़ गई।
मैंने शिकायत नहीं की,
क्योंकि मोहब्बत हिसाब नहीं माँगती।
मैंने सवाल नहीं किए,
क्योंकि सच्ची चाहत जवाब नहीं माँगती।
शेर
जिसे चाहा दिल से, उसे बदनाम कैसे करता,
मैं अपना दर्द बेचकर इश्क़ नीलाम कैसे करता।
हाँ, हालात हमारे साथ न चल सके,
वक़्त की राहें एक न बन सकीं।
किस्मत ने शायद पहले ही लिख दिया था,
कुछ दुआएँ मुकम्मल नहीं हो सकीं।
आज भी तेरी याद आए तो बद्दुआ नहीं निकलती,
बस एक दुआ चुपचाप लबों पर ठहर जाती है।
तेरी हर सुबह रोशन हो,
तेरी हर शाम सलामत हो।
जिस हाथ ने किसी और का हाथ थामा है,
वो हाथ हमेशा ख़ुशियों से भरा रहे।
जिस घर में तू मुस्कुराती हो,
वहाँ कभी कोई आँसू न ठहरे।
अगर कभी मेरी याद आए,
तो मुझे बेवफ़ा मत समझना।
मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ,
बस वक़्त आगे निकल गया।
अब मैं हँसता हूँ तो लोग कहते हैं—"सब ठीक है",
कौन समझाए, मुस्कानें भी कभी-कभी रोती हैं।
अब मैं जीता हूँ मगर बस आदत से,
वरना साँसें भी कई बार बोझ होती हैं।
आख़िरी शेर
कुछ लोग बिछड़कर भी दिल से नहीं जाते,
कुछ रिश्ते ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं हो पाते।
अब कोई पूछे—"ज़िंदा हो?"
तो बस मुस्कुरा देता हूँ।
आँखों में समंदर छुपाकर
लबों पर ख़ामोशी सजा लेता हूँ।
लगता है जैसे मेरा सपना मुकम्मल हो गया,
मरना था जिस दिन...
शायद उसी दिन मैं मर गया।